ग़ज़ल
खेत में खरपतवार बहुत
और फसल बीमार बहुत ।
दूषित हो गया सभ्य समाज
ओर रिश्ते तार तार बहुत।
गली में नहीं पटती किसी से
फेसबुक पर यार बहुत ।
तुझे चाहना मेरी जिंदगी
एक तेरा दीदार बहुत ।
एक तो कम है आमदनी
ओर महंगाई की मार बहुत ।
शब्द कम हो भले प्रेम के
पर अर्थ करो तो सार बहुत ।
खुशी नहीं बाहर दुनिया में
खुश रहने को परिवार बहुत।
— आशीष द्विवेदी साथी
