कविता

नया साल

हर साल आता है नया साल 

हम संजोते नये नये सपने 

एक एक महीने कर 

साल गुजरता जाता है 

हम आशा निराशा के बीच झूलते रहते 

कुछ सपने पूरे होते 

कुछ रह जाते हैं अधूरे 

ऐसा करते करते गुजर जाता साल

अधूरे और नये सपनों के साथ

हम फिर आने वाले नये साल का करते इंतज़ार 

और एक दिन इन्हीं सपनों के साथ

हम निकल जाते हैं  एक अनजान लोक

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020