स्वागत करें नव विहान को
नव वर्ष में आओ सभी स्वागत करें
फिर एक नव विहान को ,
भूला दें विगत बाढ़,आँधी
और भयानक तुफान को ।
क्षितिज के उसपार से उदित
आज है स्वप्निल सूरज,
नई आशा , नए विश्वास से भरा
धरती का एक-एक रज ।
धरा पल्लवित, पतझड़ गया बीत ,
हरी कलियाँ हैं आज पुष्पित,
मुस्कुरा रही हैं दशों दिशाएँ
गुंज रहा है नव संगीत ।
नभ है आज उन्माद-उन्माद
मधुर-मधुर सारा वातावरण,
बुरी स्मृतियों को बिसरा भर लाएं
आँचल में अनेक स्वर्णिम- क्षण ।
पलकों पर जमें हैं अबतक का
जाने कितने शीतल -अश्रु-कण,
चलो मिटा दें नव वर्ष में
यह सारा मिथ्या आभरण ।
— सुव्रत दे
