ग़ज़ल
इस तरह लफ़्ज़ों में शामिल तेरी दुआएं थीं
जैसे घाटी से गुज़रती हुई हवाएं थीं
कोई पुकारता था जैसे मेरे भीतर से
मेरे कानों से यूँ टकरा रही सदाएं थीं
मेरे भीतर की नमी को कोई खुरचता था
मेरे वुजूद को छूती हुई घटाएं थीं
दिलएनादां ये चिकित्सक से क्या सम्हल पाता
पास दिलबर के ही इस मर्ज़ की दवाएं थीं
उम्र जितनी भी बची है हमारे खाते में
लौट भी आओ यहीं, कह रही फिजाएं थीं
— ओम निश्चल
