लघुकथा

बेटा, ज़िंदगी आसान भी है और मुश्किल भी, फ़र्क केवल नज़र का है

प्रिय अमन,

मेरी आँखों के तारे, नूर‑चश्म,बेटा, 

तुम बचपन में मेरे कंधे पर सिर रखकर ज़िद किया करते थे, कभी नए खिलौने के लिए, कभी एक और चॉकलेट के लिए, और कभी बस यूँ ही मेरी गोद में सो जाने के लिए। आज वही सब बातें, वही सब अहसास इस ख़त के सहारे तुम्हें भेज रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरी आँखों से दूर हो और ज़िंदगी की कामयाबी की लड़ाई लड़ रहे हो।बेटा…

मैं आज‑कल खुद को कमज़ोर महसूस कर रहा हूँ। 62 वर्ष का ये सफ़र, जिसने मुझे थकने ही नहीं दिया, हमेशा सिर्फ़ बच्चों के चेहरे और उनका मुस्तकबिल ज़ेरे‑निगाह रहा। तुम्हारी मम्मी मेरे साथ हर मुकाम पर मज़बूती से मेरा हौसला बढ़ाती रही, वो भी आज‑कल कमज़ोर हो गई है, मगर अपनी थकान का इज़हार नहीं करती।  ये तुम्हें अच्छी तरह मालूम है।पर बेटा, तुम ये मत समझना कि मैं सिर्फ़ उम्र की वजह से थक गया हूँ। हक़ीक़त ये है कि मैंने अपने जीवन की सारी ऊर्जा, सारी ताक़त, अपनी सारी साँसें अपने बच्चों पर खर्च कर दी हैं। जब तुम छोटे थे, तो तुम्हारी हर हँसी मेरे लिए दवा थी और आज भी है, और तुम्हारी हर मासूम माँग मेरी थकान का इलाज। आज जब मेरा हाथ काँपता है, घुटने जवाब देने लगते हैं, तो मुझे वो दिन याद आते हैं जब तुम गिर जाया करते थे और मैं तुम्हें  फ़ौरन गोद में उठा लेता था।तुम्हें याद है न, बेटा?

तुम कितने छोटे थे नन्हे से बिल्कुल रमीज़ जैसे चंचल हम  तुम्हे दौड़ते देख खुश हुआ करते … तुम्हारी नन्ही उंगली मेरी उंगली में फँसी रहती थी। तुम दुनिया के डर से नहीं, बल्कि भरोसे से मेरे पीछे‑पीछे चलते थे। तुम्हें यक़ीन था कि अगर तुम डगमगाओगे तो तुम्हारे पिता के मज़बूत हाथ तुम्हें थाम लेंगे। आज जब मैं  सहारे से चलता हूँ, तो हर क़दम पर मुझे तुम्हारी वही नन्ही‑सी उँगलियाँ महसूस होती हैं, जैसे अब भी तुम मेरे साथ‑साथ चल रहे हो।अमन, बेटा, अब तुम बड़े हो गए हो। ज़िम्मेदारियों की दुनिया में क़दम रख चुके हो, अपने सपनों के लिए घर से दूर  हो। लेकिन तुम्हारे पिता की नज़र में तुम आज भी वही छोटे बच्चे हो, जो गिर जाने पर रोते‑रोते मेरी उंगली पकड़ लिया करते थे, जो रात को डरकर मेरे पास आकर चुपके से चिपक जाते थे।जब भी तुम घर से बाहर जाते हो या किसी नए सफ़र पर निकलते हो, दिल के अंदर कई बेचैन सवाल उठ खड़े होते हैं , ठीक से पहुँचे हो या नहीं, खाना समय पर खाया है या नहीं, पढ़ाई  के बोझ में खुद बहुत ज़्यादा थक तो नहीं  गए हो, कहीं अकेले में उदास तो नहीं बैठे हो।ये बेचैनी तुम्हारे ऊपर भरोसे की कमी नहीं, बल्कि तुम्हारे लिए मेरे दिल में बसे उस गहरे प्यार का दूसरा नाम है। एक बाप के दिल में बसने वाला डर ये नहीं होता कि बेटा नाकाम हो जाएगा, बल्कि ये होता है कि कहीं वो थक न जाए, टूट न जाए, अकेला महसूस न करे।आज तुम मेरी आँखों से दूर हो क्योंकि तुम ज़िंदगी की कामयाबी की लड़ाई लड़ रहे हो। मुझे इस बात पर फ़क्र भी है और फ़िक्र भी। गर्व इसलिए कि मेरा बेटा अपने पाँव पर खड़ा होना चाहता है, अपने सपनों को हक़ीक़त बनाना चाहता है; और फ़िक्र इसलिए कि इस जंग में कहीं वो अपने दिल की मासूमियत, अपनी सेहत, अपनी मुस्कुराहट गँवा न दे।बेटा, ज़िंदगी आसान भी है और मुश्किल भी; फ़र्क केवल नज़र के ज़ाविए का है। रास्ता कभी फूलों से भरा होगा, कभी काँटों से, कभी जीत मिलेगी, कभी हार। हार मिले तो घबराना नहीं, उसे अपनी सीख बना लेना, और जीत मिले तो उसे सिर पर चढ़ाकर मत रखना, बस क़दमों के नीचे की मंज़िल समझना, ताकि अगली ऊँचाई तक पहुँचने का हौसला बना रहे। याद रखना, ग़लतियाँ करने से डरना नहीं, जो इंसान गिरने के बाद भी उठना सीख लेता है, वही आगे चलकर दूसरों को सहारा दे पाता है।अमन, अपने सभी रिश्तों को हमेशा दिल से निभाना।

माँ की थकान को उसकी मुस्कान  को समझो,वो जब भी कहती है “मैं ठीक हूँ”, तो उस “ठीक” के पीछे उसकी पूरी ज़िंदगी की मेहनत छुपी होती है। उसके लिए दो शब्द प्यार के, एक फ़ोन, एक छोटा‑सा हालचाल भी बहुत बड़ी दवा बन जाता है। दोस्तों के साथ ईमानदार रहना, दोस्ती में स्वार्थ आ जाए तो रिश्ते का असल स्वाद खो जाता है।।पैसा ज़रूरी है, बेटा, पर याद रखना,चरित्र और सच्चाई से बड़ा कोई ख़ज़ाना नहीं। अगर कभी ऐसे मोड़ पर खड़े हो जहाँ ईमानदारी और फ़ायदे में टकराव लगे, तो अपने पिता की ये पंक्ति याद रखना: “अमन का नाम दौलत से नहीं, अपने साफ दिल से रोशन रहना चाहिए।”

मैं चाहता हूँ कि लोग तुम्हें तुम्हारी जेब नहीं, तुम्हारी नीयत और तुम्हारे व्यवहार से पहचानें।मुझे मालूम है कि हर वक़्त तुम्हारे पास आने‑जाने, फ़ोन करने या लंबी बातें करने का वक़्त नहीं होता। ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं तुम्हारी पढ़ाई सख़्त है, पढ़ाई  का बोझ  वाकई बड़ा है, थकान भी। पर जब भी फ़ुर्सत मिले, दो शब्द बात कर लिया करो। तुम्हारी आवाज़ सुनकर लगता है जैसे घर की दीवारों में फ़ि से जान आ गई हो, जैसे सूनी चौखट पर अचानक धूप उतर आई हो। तुम्हारी हर ख़बर, चाहे छोटी हो या बड़ी, मेरे लिए दवाई से बढ़कर मरहम है।अगर कभी तुम्हें लगे कि दुनिया तुम्हें समझ नहीं रही ,पढ़ाई का दबाव हो, दोस्तों की बेरुख़ी हो या अपने ही मन की उलझन तो बेझिझक अपने इस बूढ़े  मां बाप के पास लौट आना। हो सकता है  हमारे पास तुम्हारे हर सवाल का जवाब न हो, मगर तुम्हें सुनने वाला, तुम्हें गले लगाने वाला, तुम्हारे आँसू संभालने वाला एक सच्चा हमदर्द हमेशा  हमारा ही दिल होगा। याद रखना, तुम चाहे जितने भी बड़े हो जाओ, हमारे लिए तुम वही बच्चे हो जिनकी उंगली पकड़कर मैंने अपने जीवन की सबसे लंबी और सबसे प्यारी यात्रा तय की है। तुम्हारी कामयाबी की हर ख़बर मेरी कमर सीधी कर देती है, तुम्हारी छोटी‑सी परेशानी भी  हमारी रातों की नींद उड़ाने के लिए काफ़ी है। नज़रें भले कमज़ोर हो गई हों, लेकिन तुम पर मेरा भरोसा और मोहब्बत पहले से कहीं ज़्यादा गहरी  और मज़बूत हो गई है।अंत में बस इतना कहूँगा, मेरे बेटे अपना ख़याल रखना।

अपनी सेहत, अपने सपनों और अपनी इज़्ज़त  इन तीनों की हिफ़ाज़त करना। देर रात तक पढ़ते हुए अपने शरीर को मत भूल जाना, जल्दी‑जल्दी भागते हुए अपने दिल को पत्थर मत बनने देना,और हर दौड़‑भाग के बीच अपने अंदर के अच्छे, सच्चे इंसान को कभी कमज़ोर न पड़ने देना। तुम्हारे सिर को ऊँचा देखकर जो सुकून हमे मिलता है, उसे शब्दों में बाँध पाना  बस में नहीं।दुआ है कि ज़िंदगी के हर मोड़ पर तुम्हारे क़दम मज़बूती से जमे रहें,तुम हर गिरावट के बाद और बुलंद होकर उठो और जब कभी तुम किसी बड़ी मंज़िल पर पहुँचो, तो दूर कहीं बैठा ये बूढ़ा बाप  और तुम्हारी मम्मी अपने काँपते हाथ उठाकर ख़ुदा से कहे मेरे सभी बड़े बेटे बेटियों की तरह  कामयाब “ये मेरा अमन है, मेरी आँखों का तारा,यह मेरी दुआओं की ताबीर है।

तुम  हमारी  नज़रों से भले दूर हो, मगर  हमारे दिल और  दुआओँ से कभी दूर नहीं होगे। हमेशा तुम पर नाज़ करने वाला

तुम्हारा पापा

और मम्मी

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।