लघुकथा – जवाबदेही से दूर भागते युवक
“वह आज भी गैर जवाबदेही में जी रहा है।” रघु ने अपने बगल गिर की बात सोमारू से बेबाक कही। सोमारू को यह बात नागवार लगी। क्योंकि इसमें उसके बेटे की शिकायत सी लग रही थी। फिर भी उसने अनभिज्ञ बनते हुए पूछा।
“कौन?”
“आपका बेटा, और कौन ? सबकुछ जानते हुए ज्यादा अनजान मत बनिए। परेशानी में आप भी पड़ेंगे, समय रहते उसे राह पर नहीं लाए तो। हम पड़ोसी हैं, रहा नहीं गया इसलिए सतर्क करा दिए।आपके रिश्तेदार तक को कुछ नहीं समझता वह, जैसे मक्का की रोटी और साग ही सब कुछ है, उसके जैसी सबकी जिंदगी में। उसकी मांँ बीमार थी, क्यों नहीं एक टिकिया तक भी लाया,,,,,, आप लाए, जैसे हमें आपके घर की हकीकत पता ही नहीं। शादी हुई सम्राट बन गया।” रघु ने जैसे नमक मिर्ची रख दिया हो सच्चाई की सूखी रोटी पर। और ,,,, और यह बता दिया हो कि आजकल ऐसे निकल रहे हैं जवाबदेही से दूर भागते लापरवाह युवक।
— विद्या शंकर विद्यार्थी
