गहरा सच
चुप्पी बोलती है
भीड़ के शोर में
सच अकेला
ओस की बूँद
सूरज से पहले
आईना बनती
सूखे पत्ते
हवा से पूछते
जड़ें कहाँ
रात का दीपक
अंधेरे को नहीं
डर को जलाता
टूटी राहें
पैरों से नहीं
हौसले से चलती
नदी का मौन
पत्थरों को भी
संवाद सिखाता
खामोश सच
समय के हाथों
अमर हो जाता
— डॉ. अशोक
