मृगतृष्णा से परे
परख लिए दुनिया के रंग,
यहाँ किरणें भी काँच की किरचें हैं,
स्वार्थ के शूल चुभाते साये,
मित्रता की ओट में छिपते हैं।
क्यों भागूँ मृगतृष्णा के पीछे?
मैं स्वयं पुष्प-लदी डाली हूँ,
हवाओं में थिरकती मस्ती,
अपनी ही गंध की प्याली हूँ।
एकांत की लेकर मैं तूलिका,
मैं ‘अक्षरा’ खुद को निखार रही,
तौबा इन झूठी महफ़िलों से,
जो पीठ पे खंजर उतार रही।
— अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
