कविता

यह कैसा नववर्ष?

किस बात की बधाई, किस बात का है जश्न,
उत्सव भी यह विदेशी, सर्दी का बढा सितम।
पीकर शराब रात को, सडको पर नाचते,
सभ्यता और संस्कृति का, हो रहा पतन।

साल ही तो बदला है, आफत तो नही आयी,
सर्दी तो वही है ‘कीर्ति’, गर्मी तो नही आयी।
न बदले हैं दिन महीने, न परिंदों की उडान,
बदलाव नही कुदरत में, आजादी तो नही पायी।

दीजिए शुभकामनायें, और दुआ भी कीजिये,
जश्न का माहौल कैसा, नयी फसलें तो नही आयी।
चाहा था मनायेँ हम भी, नये साल का जश्न यारों,
बसन्त भी नही आया, खुशियाँ भी नही आयी।

आम वृक्ष पर बौर पलेगा, कोयल कूके शोर मचेगा,
शीतल मन्द हवायें होंगी, शिशिर ऋतु का अंत मनेगा।
खेत खेत में सरसों फूली, गेहूं की बाली झूमे़ंगी,
हर किसान प्रसन्न होगा, जब अन्न का भंडार भरेगा।

मकरन्द तलाश तितली घूमें, कलियों को भौंरे चूमे,
नवसृजन की आस जगेगी, पिया मिलन जब होगा।
त्योहारों का समय आ रहा, होली उन्माद छा रहा,
कन्या पूजन घर घर होगा, नववर्ष सखी तब होगा।

माँ शारदे का वन्दन, प्रकृति का करें अभिनन्दन,
पीत पत्र तब झर जायेंगे, बंजर में नंदन वन होगा।
फूलों से रंग चुराएँ तितली, भौंरे कलियों को चटकाएं,
घूम रहे घर आँगन उपवन, नववर्ष आगमन तब होगा।

— डॉ अ कीर्तिवर्धन