मेरी लेखनी
आज मैं प्रकृत्ति की
सुंदरता पर लिखने को
ज्यों ही अपनी लेखनी उठाई
मेरी लेखनी,
धुआं – धूल के प्रदूषणों को देख
खांसते – खांसते हांफने लगी।
तब मैंने इन्सानियत पर लिखने को
लेखनी उठाई
परन्तु मेरी लेखनी,
खून की नदियाँ बहते देख
थर – थर कांपने लगी।
तब मैंने अपनी लेखनी
प्रेमगीत पर लिखने के लिए उठाई
क्या कहूं मेरी लेखनी,
प्रेम की नग्नता को देख
शर्म से चेहरा ढांपने लगी।
अब मैंने अपनी लेखनी
सच्चाई का आईना दिखाने को
झूठ से पर्दा उठाने को,
यथार्थ को सामने लाने को
पर मेरी ही लेखनी
मुझे शक की नजरों से देखते हुए
मेरी गहराई में झांकने लगी।
— कालिका प्रसाद सेमवाल
