मन की गांठे खोलो प्रिय
जाता वक़्त कह रहा हमसे मन की गांठे खोलो प्रिय।
दुर्भावना मिटा कर सारी मन को मन से जोड़ो प्रिय।
चुक जाए कब श्वासों की गति कुछ तो ज्ञात नहीं हमको।
जन्म हमारा व्यर्थ न जाए गढ़ना है ऐसे उसको।
मात पिता जीवन के नातों को धन से मत तोलो प्रिय।
जाता वक़्त कह रहा हमसे मन की गांठे खोलो प्रिय।
दान दया दुखियो की सेवाजितना हो सहयोग करो।
धर्म कर्म ही संग रह जाते इसका सदा प्रयोग करो।
बाधाएँ आती राहों में बढ़ उनका रुख मोड़ो प्रिय।
जाता वक़्त कह रहा हमसे मन की गांठे खोलो प्रिय।
प्रतिपल जीवन नष्ट हो रहा कुछ तो तथ्य विचारों अब।
जीवन है अनमोल खजाना इसको मत धिक्कारो अब ।
फंसे प्रपंचों की झाड़ी में संभलो बाहर आओ प्रिय।
जाता वक़्त कह रहा हमसे मन की गांठे खोलो प्रिय।
राग देश को त्यागो भाई जीवन को सानंद जियो।
सुबह सलोनी रात हंसेगी सुख अमृत मकरंद पियो।
रोग दोष मिट जाएंगे सब प्रीति रीति विस्तारो प्रिय।
जाता वक़्त कह रहा हमसे मन की गांठे खोलो प्रिय।
परम ब्रह्म की रसना में रस घोल घोल मन पावन कर।
माया विरचित मृगतृष्णा में मन को नहीं अपावन कर।
सदसंगत सुंदर विचार को मन आचरण उतारो प्रिय।
जाता वक़्त कह रहा हमसे मन की गांठे खोलो प्रिय।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
