गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

दुनिया तलाशने पॅ भी तुम-सा नहीं मिला
सीरत नहीं मिली, कभी चेहरा नहीं मिला

तुम तक पहुंचने का न ज़री’अः मिला मुझे
मांझी अगर मिला तो सफ़ीना नहीं मिला

ईंटों को जोड़-जोड़ के इक घर हुआ नसीब
चांदी का, सोने का कोई पलना नहीं मिला

हासिल किया है जो भी परिश्रम के बल पे ही
विरसे में मुझको कोई रिसाला नहीं मिला

समझा लिया है ख़ुद ही को मतलब के दौर में
क्या-क्या मिला है मुझको औ क्या-क्या नहीं मिला

रूठे अगरचे एक, मना लेगा दूसरा
‘अपनी तरह से कोई अकेला नहीं मिला’

हासिल हुआ नहीं जो इबादत से भी मुझे
मिलना ही तय नहीं था तो क़तरा नहीं मिला

— डॉ पूनम माटिया

डॉ. पूनम माटिया

डॉ. पूनम माटिया दिलशाद गार्डन , दिल्ली https://www.facebook.com/poonam.matia poonam.matia@gmail.com