कैलेंडर
कोई दस्तक दे रहा है
दरवाज़े पर।
दिल ने आदतन
तुम्हारा नाम लिया।
उम्मीद ने झिझकते हुए
कुंडी हिलाई,
यादों ने खिड़की से
झांककर देखा।
मगर बाहर
न तुम्हारी आहट थी,
न वही चुप्पी
जो सिर्फ़ तुम लाते थे।
बाहर खड़ा था
चमकदार झूठ,
हाथ में कैलेंडर,
होठों पर मुस्कान।
कितना अजीब है—
समय आता रहा,
साल बदलते रहे,
तुम नहीं आए।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
