टूटा हुआ आदमी
टूटे हुए आदमी को पूरी तरह तोड़ देना चाहिए,
उन्हें वक्त के रहमोकरम पर छोड़ देना चाहिए,
कब,क्या,कुछ हो जाये वो अनजान है,
वैसे ही हालातों से मारा वो बेजुबान है,
घर को संवारने वाले आग धधका रहे हैं,
जिम्मेदार की टूटती आशाओं से परे गा रहे हैं,
सबको अपनी ही पड़ी है,
देखो जरा किसके आगे मौत खड़ी है,
कोई तिल तिल घुट घुट मर रहा है,
सारे सपने एक एक कर बिखर रहा है,
काम का दबाव,
जिम्मेदारी का दबाव,
अपनी लाचारी का दबाव,
वो साहस ही नहीं कर पा रहा कि
लटक जाये कहीं किसी सुकून भरे जगह,
जिसके लिए भरे पड़े हैं वजह ही वजह,
पर सबको पड़ी है अपना सुकून,
हर हाल में पूरे हो चाहा जुनून,
भूलकर कि कोई अभी भी वक्त के आगे जूझ रहा है,
अपनों के दिये जख्म सहला उसे बूझ रहे है,
नींद आने के लिए तैयार नहीं है,
वो आ जाये खुदबखुद ऐसा यार नहीं है,
सच्ची यारी सिर्फ मौत निभाती है,
जो एक दिन निश्चित ही आती है,
ऊपर से मजबूत दिखता वो अंदर से बिखर सकता है,
मौत का इंतजार करता वो रोज रोज मर सकता है।
— राजेन्द्र लाहिरी
