कविता

मंज़िल जरूर मिलेगी

नव वर्ष ने दी है दिलों में दस्तक प्यारी,
उमंगित हुई फिर से ये जिंदगानी सारी,
करेंगे फिर से ख्वाबों को पाने का प्रयास,
बदलेंगे असफलताओं का पुराना इतिहास ।

संकल्प शक्ति के रथ पर होकर सवार,
भरेंगे हम रंग रंगीन सपनों में बेशुमार,
हक़ीक़त को हौसलों से फिर से बदलेंगे,
अपनी अभिलाषाओं को जीवंत करेंगें ।

क्यों रूके और माने हम सरलता से हार,
हार को जीत में बदल सकते हैं हम यार,
जज़्बा हमारा कम तनिक भी नहीं होगा,
रोशन मुकम्मल जहॉं हमें एक दिन मिलेगा‌ ।

हमारा संघर्ष जितना होगा अधिक गहरा,
अंत में देगा वो अनंत “आनंद” भी सुनहरा,
साधना सुकर्मों की सफ़लतम अवश्य होगी,
एक न एक दिन हमें मंज़िल जरुर मिलेंगी ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु