खामोश हूं
खामोश हूं!
लेकिन,
तटस्थ नहीं हूं मैं
बल्कि,
देख रहा होता हूं
किनारे पर बैठकर!
देखना,
साक्षी होना,,
और जानना,,,
जो किसी ने नहीं
जाना हुआ रहस्य!
मैं भी बैठा हूं
हजारों घात प्रतिघातों का
पुख्ता सबूत लेकर!
पूछते हो?
बल्कि,
मैंने देखा है तुम्हें
तुमसे भी करीब से
और समझा है,
तुम भी भूल चुके
रहस्य की इतिहास को!
— मनोज शाह मानस
