गीतिका
सिर झुका के ही चलूँ मैं, यह जमाना चाहता है,
क्यों उठा है सिर मेरा, सिर को झुकाना चाहता है।
आज तक मैंने नहीं सौदा किया मजबूरियों का,
वह मुझे मजबूर करके ही दबाना चाहता है।
धन मुझे उसने दिया है इस तरह से फेंक,जैसे,
वो अना मेरी दबा, घुटनो पे लाना चाहता हैं।
जो दिया था फेंककर तूने, उसे ठुकरा दिया है,
दिल अभी भी ये अना, अपनी बचाना चाहता है।
वो शिकारी है, नहीं आती दया उसको किसी पर,
फायदा मजबूरियों का,वो उठाना चाहता है।
आत्मा, संवेदना जिसकी यहाँ पर मर चुकी हो,
तू उसे इन आंसुओं को, क्यों दिखाना चाहता है।
मौत पर मेरी उन्होंने, खूब हर्जाना दिया हैं,
पुल गिरा क्यों, ये नहीं बस, वो बताना चाहता है।
प्यार से तू देख ले, हम तो सदा को मर मिटेगें
कत्ल करके क्यों दगा से, तू मिटाना चाहता है।
— शालिनी शर्मा
