पुस्तक समीक्षा: “मैं जीवन हूँ”

जिज्ञासा प्रकाशन गाजियाबाद के तले प्रकाशित हुई पुस्तक”मैं जीवन हूँ”, जिसके लेखक जीवन वैरागी हैं, एक संवेदनात्मक और प्रेरणादायक कृति प्रतीत होती है। पुस्तक का शीर्षक और आवरण पृष्ठ ही इसके भीतर छिपे गहरे जीवन दर्शन का संकेत देते हैं।यह पुस्तक अठारह लघु कहानियों का सुंदर संग्रह है।लेखक ने इस पुस्तक को प्रतिभा शर्मा,कुलदीप चंदेल , डॉ० अनीता शर्मा और डॉ० जय अनजान को समर्पित किया है जिनकी प्रेरणा ने उनको पुस्तक लिखने को प्रेरित किया है। लेखक जीवन वैरागी वैसे तो कविताएं भी लिखते है परंतु कहानियाँ लिखने में उनको महारत हासिल है। उनकी कहानियाँ देश के मशहूर पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। मैं जीवन हूँ लेखक का पहला कहानी संग्रह है जो प्रकाशित हुआ है। लेखक ने पुस्तक के प्रारंभ में ही अपने मन की बात में स्पष्ट शब्दों में अपनी प्रेरणा को दर्शाया है। समीक्षा को मुख्य छः बिंदुओं के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं, जिसमें मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि मैं कहानी संग्रह के सारे संदेशों को उजागर करूं।
१. शीर्षक और आवरण की सार्थकता
पुस्तक का शीर्षक “मैं जीवन हूँ” पाठक के मन में तुरंत एक जिज्ञासा उत्पन्न करता है। यह शीर्षक ‘स्व’ की खोज और अस्तित्व के बोध को दर्शाता है। आवरण पर एक ढलते या उगते सूरज की पृष्ठभूमि में पहाड़ों और हरियाली के बीच लेखक की मुस्कुराहट भरी तस्वीर यह बताती है कि यह पुस्तक प्रकृति, शांति और मानवीय अनुभवों का एक मिश्रण है। यह “जीवन” को केवल एक नाम के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है।
२. विषय वस्तु और शैली
जीवन वैरागी की यह कृति मुख्य रूप से आत्मकथात्मक और दार्शनिक शैली में लिखी गई लगती है। लेखक ने पूरी कोशिश की है कि उसके द्वारा लिखी गई भाषा एक आमजन भी आसानी से समझ सके।पुस्तक के मुख्य विषय संभवतः निम्नलिखित बिंदुओं के इर्द-गिर्द घूमते हैं:
अस्तित्ववाद: लेखक ने अपने अनुभवों के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि जीवन क्या है और इसे कैसे अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है।पहली कहानी भगवान परीक्षा लेते हैं में लेखक ने कुंदन के माध्यम से बताने की कोशिश की है कि आदमी को कम में भी संतुष्टि करनी आनी चाहिए।कुंदन पिता के साथ अस्पताल में रहकर मजबूत हो चुका था। इसलिए उसने अपने भाई का मन रखने के लिए आइसक्रीम आधी खा ली।
सादा जीवन और उच्च विचार: लेखक के उपनाम ‘वैरागी’ से स्पष्ट है कि इसमें सांसारिक मोह-माया के बीच रहते हुए भी एक वैरागी की तरह तटस्थ रहने का संदेश छिपा है।कहानी गूगल पे का जमाना के माध्यम से लेखक आधुनिक जमाना और मूलभूत जरूरत के अनुसार ढलने का संदेश देता है। अगर आधुनिकता के दौर में हम जी रहे है तो हमको अपनी ज़रूरतों के अनुसार अवश्य ही चलना चाहिए।
अनुभवों का पिटारा: यह पुस्तक लेखक के बचपन, संघर्ष, सफलता और उनके द्वारा सीखे गए जीवन के सबक का एक संकलन है। कुर्सियां कहानी के माध्यम से लेखक ने मोहन बाबू और सावित्री के संवादों से स्पष्ट संदेश दिया है कि हमको अपने अनुभवों से ही काम लेना चाहिए । किसी भी बात का घमंड नहीं करना चाहिए।
३. भाषाई विश्लेषण
लेखक ने हिंदी भाषा का बहुत ही सरल, सहज और मर्मस्पर्शी प्रयोग किया है। भाषा में कठिनाई न होने के कारण यह आम पाठक से सीधा संवाद करती है। उनकी लेखन शैली में एक प्रकार की काव्यात्मकता है, जो गद्य को भी रोचक बना देती है। कहीं कहीं टंकण अशुद्धि और व्याकरण /वर्तनी त्रुटि रह गई है परंतु कहानी की रोचकता उसको एकदम से ढक देती हुई प्रतीत होती है। तबादला कहानी में संजीव जहाँ सब कुछ होते हुए भी अपने तबादले के लिए परेशान रहता है वहीं दूसरी ओर इक लड़का अपने घर कोटगढ़ से दो सौ किलोमीटर दूर अपनी बीमार माँ को अकेला छोड़कर सात हजार की नौकरी करने को तैयार होता है।मजबूरी क्या होती है,ये संजीव को बखूबी समझ आ गई।
४. प्रमुख संदेश और दर्शन
“मैं जीवन हूँ” केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर उस इंसान की कहानी है जो भीड़ में अपनी पहचान ढूँढ रहा है। कहानी मजदूर के माध्यम से एक बहुत गूढ़ संदेश देने की कोशिश की गई है जहां फैक्ट्री के मैनेजर मजदूरों को सम्मानित करने का ढोंग तो करते है वहीं सामने एक मजदूर जिसके पैर से खून बह रहा था,तब भी मजदूरी कर रहा था और सोच रहा था कि यह मजदूर दिवस आखिर क्या होता है? लेखक ने प्रसव पीड़ा कहानी से जहाँ एक ओर पाठकों को इस कहानी को पढ़ने को विवश होने को मजबूर किया है वहीं एक नशे से दूर रहने का संदेश देने की कोशिश भी की है। कहानी मातृत्व दिवस,वृद्धा आश्रम, रोटी की कीमत,बिटिया की शादी और सूने खूंटे के माध्यम से पाठकों को झकझोर करने वाला संदेश देने की कोशिश की है कि समय रहते हुए हमको सब चीजों को कद्र करनी आनी चाहिए।
५. पाठकों पर प्रभाव
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक मार्गदर्शिका की तरह है जो तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति और प्रेरणा की तलाश कर रहे हैं। लेखक ने अपनी बातों को उपदेश की तरह देने के बजाय एक मित्र की तरह साझा किया है, जिससे पाठक स्वयं को उनके अनुभवों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। वो फैक्टरी वाले जूते ,बुद्धि में बल होता है और बारहवीं की विदाई पार्टी कहानियों के माध्यम से लेखक की बाल मन को छूने को कोशिश रंग लाती नजर आती है।
६. निष्कर्ष
लेखक जीवन वैरागी की “मैं जीवन हूँ” एक ऐसी कृति है जो हमें ठहरकर यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम भागदौड़ में क्या पीछे छोड़ रहे हैं। यह पुस्तक सकारात्मकता का संचार करती है और पाठकों को अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है। यह कहानी संग्रह छोटे बच्चों ,नौजवानों और वृद्ध लोगों को बहुत ही पसंद आएगा। इस संग्रह में लेखक ने सब पीढ़ियों का ध्यान रखते हुए कहानियों को क्रमबद्ध श्रृंखला में ऐसा जोड़ा है कि यदि एक बार पाठक एक पुस्तक को पढ़ने बैठ जाएगा तो इसको पूरी पढ़ कर ही दम लेगा क्योंकि कहानियों में रोचकता इतनी अधिक है कि एक कहनी खत्म होती नहीं कि दूसरी को पढ़ने का मन स्वतः ही हो जाता है।यदि आप जीवन के वास्तविक अर्थ और मानवीय संवेदनाओं को समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके संग्रह में अवश्य होनी चाहिए। लेखक को भविष्य हेतु और कहानी संग्रह लिखने के लिए शुभकामनाएं।
समीक्षक —
कैप्टन डॉ. जय महलवाल (अनजान)
पुस्तक समीक्षा: “मैं जीवन हूँ”
लेखक–जीवन वैरागी
प्रकाशन– जिज्ञासा प्रकाशन गाजियाबाद
मूल्य–₹१५०
आई बी एस एन –९७८–९३–४९६२९–६२–२
उपलब्धता–amazon.in
समीक्षक– कैप्टन डॉ० जय महलवाल (अनजान)
ईमेल– drsaabmath@gmail.com
