कविता

अब

अब नहीं अच्छा लगता यू किताबों से उलझना
उनमें खो जाना, उनसे बातें करना ,
उन्हें समझना और फिर उलझन में पड़ जाना ,
अब लगता है तो खुद अपनी एक किताब लिख दूं
अपने विचारों से दुनिया को अवगत करवाऊं ।
अब नहीं अच्छा लगता यू किसी से भी दोस्ती करना ,
उनकी कही बातों को सुनना, मशवरा देना ,
उनका रूठना, फिर उन्हें मनाना ,
अब लगता है तो खुद सबकी दोस्त बन जाऊ ,
और उनकी हमदर्द बन जाऊ ।
अब नहीं अच्छा लगता यू वे बजह के रिश्ते बनाना,
उनके लिए अपनी जान न्यौछावर करना ,
उनकी कही बातों को मानना,
अब लगता है तो एक ऐसा अटूट बंधन बनाऊं,
जो कभी टूटे नहीं फिर….

— गंगा मांझी

गंगा मांझी

ग्वालियर, मध्य प्रदेश