गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बराबर धुंध, बदरी चल रही है
अभी तक शीतलहरी चल रही है

रहे कर ऐश ए सी में प्रणेता
कि कोई बात गहरी चल रही है

सवेरा आ मिलेगा इस तरह भी
भले ये रात ठहरी चल रही है

अभी है आस पूरी एक गठरी
अभी है साँस ठठरी चल रही है

हवा, पानी नहीं जब साफ़ फिर क्या
ग़िज़ा लेती कि नगरी चल रही है

ठसाठस लोग भी आ-जा रहे हैं
सड़क पर धूल पसरी चल रही है

ढला दिन पास काजू है न व्हिस्की
अड़ी पर चाय-मठरी चल रही है

— केशव शरण

केशव शरण

वाराणसी 9415295137