उजालों के आसपास
भोर की चुप्पी
दीपक की लौ काँपी
रात पीछे हटी
ओस की बूँद
पत्ते का मौन स्पर्श
सूरज मुस्काया
छाया सिमटी
कदमों में रोशनी
रास्ता जागा
नीला आकाश
पंछी की एक पुकार
मन हल्का हुआ
टूटी दीवार
दरार में उजाला
बीज ने दम लिया
सांझ की लकीर
घर लौटता विश्वास
दीप फिर जला
— डॉ. अशोक
