पुस्तक समीक्षा

कर्नल जसवंत सिंह चंदेल द्वारा रचित “मेरी याददाश्त” पहाड़ी (कहलूरी) भाषा में लिखा गया 84 कविताओं का सुंदर संग्रह है, जो हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर क्षेत्र की साहित्यिक परंपरा को समृद्ध करने वाला एक महत्वपूर्ण योगदान है। कवर पर अंकित छवि—सूर्यास्त की लालिमा में अकेला बूढ़ा व्यक्ति, बैसाखी और पेड़ों की छाँव में खड़ा—पुस्तक के मूल स्वर को प्रकट करती है: स्मृतियों की यात्रा, जीवन की संध्या, प्रकृति से गहरा लगाव और समय के साथ आए बदलावों का दर्द। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि एक सैनिक की आत्मकथात्मक यादों का काव्यात्मक रूपांतरण है, जहाँ सेना के कठोर अनुशासन से निकलकर कोमल भावनाओं की दुनिया में प्रवेश किया गया है।
कर्नल जसवंत सिंह चंदेल (वी.एस.एम.) का जन्म 27 जुलाई 1945 को बिलासपुर जिले के डुडियां गांव में हुआ। अब वे कलोल नामक स्थान पर बॉडीगार्ड हाउस में रहते हैं । देश के लिए प्रेम उनके अपने घर के दिए हुए नाम से ही झलकता है। भारतीय सेना में लंबी सेवा के दौरान उन्होंने विशिष्ट सेवा मेडल प्राप्त किया, जो उनके साहस और समर्पण का प्रमाण है। सेवानिवृत्ति के बाद वे साहित्य, समाजसेवा और बिलासपुर लेखक संघ जैसे संगठनों से जुड़े रहे। वे 12 से अधिक पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें से “मेरी याददाश्त” उनका पहाड़ी कविता संग्रह है। यह पुस्तक उनके सैन्य जीवन, गांव की स्मृतियों, परिवार, प्रकृति, सामाजिक मूल्यों और बुढ़ापे की संवेदनाओं को केंद्र में रखती है।
पुस्तक का शीर्षक “मेरी याददाश्त” अत्यंत सार्थक है। याददाश्त यहां मात्र स्मरण शक्ति नहीं, बल्कि जीवन की पूरी किताब है—जिसमें खुशियां, दुख, संघर्ष, प्रेम और अलगाव सब दर्ज हैं। कवि बार-बार अतीत की ओर लौटते हैं, जैसे कोई बूढ़ा सिपाही युद्ध की यादों में खो जाए या कोई पहाड़ी बुजुर्ग गांव की पुरानी गलियों में भटक जाए। पहाड़ी भाषा का प्रयोग यहां विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह भाषा सरल, मधुर और हृदयस्पर्शी है। कहलूरी बोली में लिखी कविताएं स्थानीय संस्कृति, लोक-जीवन, ऋतु-परिवर्तन और पहाड़ों की मिट्टी की खुशबू से सराबोर हैं।
विषय-वस्तु और थीम्स
संग्रह की अधिकांश कविताएं स्मृति-प्रधान हैं। कवि अपने बचपन, स्कूल-जीवन, सेना में भर्ती होने की घटनाओं, युद्ध-क्षेत्र के अनुभवों, परिवार से दूर रहने की पीड़ा और सेवानिवृत्ति के बाद गांव लौटने की भावनाओं को काव्य रूप देते हैं। एक प्रमुख थीम है प्रकृति और मानव का संबंध। पहाड़, नदियां, जंगल, सूर्योदय-सूर्यास्त, बरसात और बर्फबारी जैसी छवियां बार-बार आती हैं। उदाहरणस्वरूप, कवर फोटो की तरह कई कविताओं में सूरज ढलते समय की उदासी या सुबह की ताजगी को व्यक्त किया गया है।
दूसरी महत्वपूर्ण थीम सैनिक जीवन की कठोरता और कोमलता का द्वंद्व है। कवि एक ओर तोपों, बारूद और अनुशासन की बात करते हैं, तो दूसरी ओर मां की गोद, पत्नी की प्रतीक्षा और बच्चों की मासूमियत को याद करते हैं। यह द्वंद्व पुस्तक को गहराई प्रदान करता है। कई कविताओं में देशभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान की भावना है, लेकिन इसे कहीं भी अतिरंजित या नारे बाजी वाला नहीं बनाया गया। बल्कि, यह व्यक्तिगत अनुभवों से निकली सच्ची भावना है।
बुढ़ापे और मृत्यु का भय भी संग्रह में प्रमुखता से उभरता है। कवि अक्सर पूछते हैं—यादें कितनी देर साथ रहेंगी? शरीर कमजोर पड़ रहा है, लेकिन मन अभी भी युवा है। यह चिंतन पहाड़ी साहित्य में दुर्लभ गहराई लाता है। साथ ही, सामाजिक मूल्य, पड़ोस-रिश्ते, मेहमाननवाजी, गरीबी में भी खुश रहना जैसी बातें कविताओं में झलकती हैं।
भाषा-शैली और लिखावट–
कहलूरी (बिलासपुरी पहाड़ी) भाषा का प्रयोग इस संग्रह की सबसे बड़ी ताकत है। यह भाषा बोलचाल की है, इसलिए कविताएं पढ़ते समय लगता है कि कोई बुजुर्ग पड़ोसी अपनी कहानी सुना रहा है। कविताओं को लेखक ने इतने सुंदर ढंग से व्यवस्थित किया है कि पढ़ने की रोचकता और बलवती होती जाती है। ज्यादातर कविताओं में छंद और लय सरल हैं—ज्यादातर मुक्त छंद या लोकगीत शैली में। अलंकारों का प्रयोग कम है, लेकिन उपमा, रूपक और मानवीकरण प्राकृतिक रूप से आते हैं। जैसे, पेड़ों को बूढ़े दोस्तों की तरह या नदी को जीवन की धारा के रूप में चित्रित करना।
कविताएं भावुक हैं जिनमें कवि की सैन्य पृष्ठभूमि के कारण भाषा में संयम और अनुशासन दिखता है। शब्द चयन सटीक है—पहाड़ी मुहावरे, लोक-साहित्य के तत्व और सैन्य शब्दावली का मिश्रण इसे विशिष्ट बनाता है।
विशेष कविताओं का उल्लेख–
हालांकि पूरी पुस्तक पढ़ने के लिए निरंतर बैठना पड़ेगा और अतीत के साथ साथ वर्तमान में भी खोना पड़ेगा लेकिन उपलब्ध संदर्भों से कुछ प्रमुख कविताओं की झलक मिलती है। एक कविता में कवि कहते हैं कि “खुद खाने से पहले बांट लेता हूं थोड़ा सा”—यह उनकी उदारता और सामाजिक संवेदना को दर्शाता है। दूसरी कविताओं में “निक्का जेया फौजी” जैसी पंक्तियां उनके फौजी जीवन की छोटी-छोटी यादों को जीवंत करती हैं। सैनिक अधिकारी होने के नाते उन्होंने सन पैंसठ की लड़ाई, म्हारे कानून पुराने, म्हारा हिंदुस्तान,देश अपना, गणतंत्र दिवस जैसी कविताएं सुंदर तरीके से लेएं पिरोई हैं । एक कविता 370 में लेखक लिखते है कि–
सरकारे 370 कश्मीरा ते क्या हटाया,
गैसा रा गोला पड़ोसियां पेटा गड़गड़ाया।
इस कविता में लेखक ने एकता का संदेश बहुत ही हल्के फुल्के अंदाज में दिया है। कई कविताएं हास्य और व्यंग्य से भरी हैं जिनमें फ़ौजिए री लाड़ी, करमु, साग, बांदर, पूजहु,तोता कुक्कड़, अवतारा रा ब्याह, जनानां रा बुता, दीपू चलया ब्याने, हैं जो पहाड़ी लोक-जीवन की चतुराई दिखाती हैं।
साहित्यिक महत्व और कमियां
“मेरी याददाश्त” पहाड़ी साहित्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। हिमाचल में हिंदी और पहाड़ी दोनों में लेखन हो रहा है, लेकिन कहलूरी जैसी उप-भाषा में इतना संवेदनशील संग्रह दुर्लभ है। यह स्थानीय भाषा को संरक्षित करने का प्रयास भी है। कवि की उम्र (80+) और अनुभव इसे प्रामाणिक बनाते हैं।
सुनों मेरी गल कविता में कवि सुंदर और सभ्य तरीके से कहता है कि–
पुत बहू रैंदे कहरा ते दूर,
असे दोनों रैंदे कहरैं जरूर।
इसमें कवि द्वारा अपने घर की चिंता को बखूबी जाहिर किया गया है कि घर बार नहीं छोड़ना चाहिए।
कविता संग्रह में कुछ कमियां भी हैं—कभी-कभी कविताएं दोहराव वाली लगती हैं, क्योंकि स्मृतियां एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। छंदबद्धता की कमी कुछ पाठकों को आधुनिक लग सकती है, लेकिन यह मुक्त भावना के लिए आवश्यक भी है। प्रकाशन गुणवत्ता सरल है, जो छोटे शहरों के संग्रहों में आम है।
सारांश–
“मेरी याददाश्त” एक सैनिक की कोमल अंत:प्रकृति का सुंदर दस्तावेज है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो पहाड़ों की सादगी, स्मृतियों की ताकत और जीवन की क्षणभंगुरता को समझना चाहते हैं। कर्नल जसवंत सिंह चंदेल ने साबित किया कि बंदूक थामने वाले हाथ कविता भी रच सकते हैं—और वह भी हृदय को छूने वाली। यह संग्रह न केवल बिलासपुर या हिमाचल, बल्कि समस्त हिंदी/पहाड़ी पाठकों के लिए स्मरणीय है।
यदि आप पहाड़ी साहित्य प्रेमी हैं या जीवन की गहराई को सरल शब्दों में पढ़ना चाहते हैं, तो यह पुस्तक अवश्य पढ़ें। यह याद दिलाती है कि याददाश्त केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान को जीने की शक्ति भी है। मेरी सभी पाठकों से गुजारिश है कि इस का कविता संग्रह को अवश्य पढ़ें।
मेरी तरफ से कवि को भविष्य हेतु ढेर सारी शुभकामनाएं।
मेरी याददाश्त: पहाड़ी (कहलूरी) कविता संग्रह
प्रकाशक– कर्नल जसवंत सिंह चंदेल, वी एस एम
मुद्रक – शंकर प्रिंटिंग प्रेस घुमारवीं
मूल्य– 350 रुपए
पृष्ठ –104
समीक्षक – कैप्टन डॉ. जय महलवाल अनजान
