माँ
माँ आज खुश बहुत है
बुझे हुए चेहरे पर रौनक है….
उनके धीरे-धीरे पैरों की चाल ने
तेज रफ्तार ली है
देख रही बूढ़ी आँखों से वह
कभी दरवाजे की ओर तो
कभी गली को दूर तलक….
आँखों की
धुंधली रौशनी आज
चमक उठी है
बेटे के घर आने की खबर ने
जादू दिखाई है
भूल बैठी है वो अपने शरीर के बूढ़ेपन को
दवाईयों के साथ काट रहे
लाचार जीवन को
पूरे घर को महसूस हो रहा आज
उनके पैरों की धीमी थाप
कोने- कोने से कर रही बातें
फुसफुसाते हुए ठीक करती
बिखरी चीजें….
गुमसुम दीवारें
आज कमरों में अपनी हंसी
बिखेर रही
जैसी तोड़ी हो वर्षों की चुप्पी….
रसोई आज फिर से
स्वाद का तड़का लगाई है
फैलती खुशबुओं ने
दे दी है संदेश पड़ोसियों को
आज हर पकवान स्वादिष्ट है
उत्साह से माँ
फुले न समाती
निकालती बक्से से
वर्षों पुरानी एक नई साड़ी….
पहनती करती शृंगार
हाँ!
बेटे के लिए भी
माँ होती है तैयार….
हर बच्चे के लिए
उसकी माँ
होती है सबसे प्यारी
और माँ होना ही
माँ की है खूबसूरती
हैं ना!
— बबली सिन्हा वान्या
