आओ सिर्फ भारतीय बनें
हर तरफ नजर आ रही व्यवस्था चौबंद चाक,
अपने ही शहीदों के बलिदान रहे हैं क्यों नाप,
बताओ जरा क्या उन सबने दी थी कुर्बानी
अपनी जाति,धर्म या सम्प्रदाय के उत्थान खातिर,
फिर क्यों बन रहे इन सबके नाम पर शातिर,
आत्मबलिदान था केवल अपने देश के लिए,
संस्कार,संस्कृति,सभ्यता और परिवेश के लिए,
विदेशों में जा क्या देते हो परिचय अपनी जाति का,
अपने मशहूर खानदान और ख्याति का,
नहीं वहां कहना पड़ता है खुद को भारतीय,
समता,समानता होता है जहां न पूजा न आरती,
सम होने के प्रतीक बन हाथ मिलाते हो,
रंग रूप को भूलकर सबको गले लगाते हो,
फिर लौटकर अपने ही वतन में,
भूल वही सभ्यता क्यों आग लगाते हैं चमन में,
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र,
ले विश्वबंधुत्व का मूलमंत्र,
कहते हैं कि चलना है केवल शांति की राह,
आंतरिक सामाजिक व्यवस्था में भी दिखाओ चाह,
न हो कोशिश कि दूर हो जाये
हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख,ईसाई,
टूटे न रिश्ता आपस में हैं जो भाई भाई,
हमारी रक्षा के लिए खड़ा है संविधान,
सभी चाहते हैं न हो इसके मूल भावना का अपमान,
तो आओ आज कसम खाएं,
इनका उनका तेरा मेरा सब कुछ भूल
हर मौके को भारतीय बन खुशी से मनाएं।
— राजेन्द्र लाहिरी
