उधार की ताकत ठीक नहीं है
धूप उधार लो
तो छाँव भी माँगे
अपनी नहीं लगती
कर्ज़ की तलवार
चमकती है पल भर
हाथ ही काटे
उधार का साहस
भीतर से खोखला
शोर बहुत करता
पराई बैसाखी
चलना सिखाती नहीं
आदत बिगाड़े
अपनी ज़मीन पर
नंगे पाँव चलना
सच का हुनर है
उधार की जीत
जश्न में भी डर
साथ लिए फिरती
जो खुद खड़ा हो
उसकी चुप्पी में भी
ताकत बसती है
उधार का सहारा
वक़्त पर छूट जाए
लज्जा छोड़ जाए
स्वाभिमान की आग
धीमे जलती रहती
अंधेरा हरती
अपनी मेहनत
सबसे पुख़्ता ढाल
सबसे सच्ची शक्ति
— डॉ. अशोक
