राजनीति

उल्लास पर्व गणतंत्र का

आज हम गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। यह ख़ास दिन है जो उस तंत्र की गरिमा को बखान करने वाला है जिसकी बदौलत आज हम स्वतंत्र भारत में प्रजातांत्रिक मूल्यों के उत्कर्ष और जन-जन के उत्थान के गीत गा रहे हैं।

हमारा गणतंत्र अब परिपक्व हो चला है। लोकतांत्रिक विलक्षणताओं और अद्भुत परंपराओं के साथ चलकर आया गणतंत्र अब प्रौढ़ हो चला है। गणतंत्र दिवस का उल्लास आज चहुँ ओर पसरा हुआ है और ऐसा ही हर साल होता रहा है।

फिर भी आत्मचिन्तन का विषय है कि गणतंत्र अपनी प्रौढ़ावस्था को भी पार कर चुका है और हम हैं कि आज भी अपने आपको शैशव में ही मानकर नादानियों में ही जी रहे हैं।  गणतंत्र की परिपक्वता के लिए गण और तंत्र दोनों का पूर्ण परिपक्व, शुचिता सिक्त और मंगलकारी होना जरूरी है।

यह दिगर बात है कि इन तीनों ही मामलों में अभी हम साफ-साफ कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हैं। तंत्र से जुड़े तांत्रिकों और गण के बीच आत्मीय संवाद, परस्पर हितग्राही संबंध और तीव्रतर विकास की अवधारणाओं को मूर्त रूप देने वाले कारकों और बुनियादी तत्वों को अभी उतनी मजबूती नहीं मिल पायी है जितनी कि अपेक्षित थी। 

दोनों ही ओर से कुछ न कुछ ऐसा बाकी रह गया है कि उतनी श्रद्धा और विश्वास की लहरें अभी नहीं उठ पायी हैं जिनकी उम्मीद की जा रही थी। गण अपने अधिकारों पर अधिक जोर देने लगा है और कर्त्तव्यों की दिशा में जागरुकता का अभाव दिखाई देने लगा है।

उधर तंत्र में भी धर्म, सत्य और नीति-न्याय के मूलभूत सिद्धान्तों की बजाय अदूरदर्शितापूर्ण सम सामयिक और तात्कालिक लाभ-हानि के समीकरणों और समझौतों को कभी आकार मिल जाता है और कभी ये मूल्य ध्वस्त होते नज़र आते हैं। तंत्र पर तरह-तरह के सिद्ध और परम्परा से जड़ें जमाए हुए तांत्रिकों का प्रभाव देखा जा रहा है और उनके लिए आम गण की अपेक्षा अपने ही अपने लोगों का कुनबा दिखाई देने लगा है।

 सब तरफ हौड़ मची है अपनों को उपकृत करने की। हर कोई भिड़ा हुआ है कोई न कोई दर्जा पाने के लिए। इंसान होने का दर्जा भले न मिल पाए, कोई आयातित दर्जा मिल जाना चाहिए, चाहिए उसके लिए कितने ही पापड़ बेलने पड़ें, रोटियां और बाटियां सेंकनी पड़ें या कुछ और ही क्यों न करना-करवाना पड़ जाए। सारे के सारे यही चाहते हैं कि अश्वत्थामा की तरह कोई न कोई मणि उनके सर पर भी सजी हो, और मरते दम तक उसे कोई निकाल न पाए।

अपनों की परिभाषाओं का कोई मानक स्वरूप आज के जमाने में रहा ही नहीं। जो अपने लिए काम आ सकता है वह अपना, चाहे वह दुनिया-जहान के लिए कितना ही खोटा क्यों न हो।

 हर साल आने वाला गणतंत्र दिवस गण और तंत्र दोनों को अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों को भान कराने आता है और हम हैं कि एक-दो दिन की उत्सवी रंगत में खोकर साल भर के सारे चिन्तन और मनन से प्राप्त निष्कर्षों और संकल्पों को भुल जाते हैं।

हमारे लिए गणतंत्र दिवस का अर्थ अब औपचारिकता का निर्वाह करना ही रह गया है। हम सभी गण अपना आत्म मूल्यांकन करें कि आखिर पिछले गणतंत्र दिवस के बाद से हमने क्या ऐसा जोड़ा है कि गणतंत्र दिवस मनाने में गर्व और गौरव का अनुभव करें। तो पता चलता है कि कुछ ही लोग होंगे, जो कि इस दिशा में सोच-विचार कर समाज, क्षेत्र और देश के प्रति अपने संकल्पों को साकार कर पाते हैं।

 हम सभी लोग तो गणतंत्र दिवस के उल्लास में सब कुछ इतना अधिक भूल जाते हैं कि हम गण और गणराज्य के लिए क्या कुछ करना चाहते हैं और क्या कुछ कर सकने की स्थिति में अपने आपको पाते हैं, यह भी याद नहीं रहता।

हमारे हर उत्सव हम सभी के लिए कोई न कोई संदेश लेकर ही आते हैं और भविष्य में हमें नवीन और परिष्कृत रूप में देखना चाहते हैं लेकिन हम अपने ही आलस्य, प्रमाद और संकीर्णताओं में इतना अधिक खो जाते हैं कि कुछ भी नया या उल्लेखनीय नहीं कर पाते हैं।

गणतंत्र दिवस गण और तंत्र दोनों के लिए कुछ कहने आता है, बहुत कुछ कहना चाहता है लेकिन हम औपचारिकताओं के निर्वाह में ही रमे रहते हैं और इस पर्व के मूल संदेश को अनसुना कर दिया करते हैं। जो हो चुका उसकी परवाह न करें, वो तो होना ही था। बीति ताहि बिसारियें आगे की सुध लेय। इस बार का गणतंत्र दिवस कोरा नहीं जाना चाहिए।

आईये अपने उन बंधुओं और भगिनियों की सेवा, सहायता और उपकार के लिए अपने आपको समर्पित करें, समाज और देश के लिए कुछ ऐसा करें कि हमारा यह गणतंत्र दिवस आने वाले कई बरसों तक याद रहे और हममें स्फूर्ति, ऊर्जा एवं परोपकारी सेवा भावनाओं का संचार करता रहे।

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ …

– डॉ. दीपक आचार्य

*डॉ. दीपक आचार्य

M-9413306077 dr.deepakaacharya@gmail.com