उठो उठो हे स्त्री
अभी तो उसने फिर से जीना शुरू किया था
पति के वियोग के बाद।
धीरे-धीरे साँसों में लौटने लगी थी धड़कन,
वजह था उसका एकमात्र पुत्र,
जिसने अभी एक वर्ष पहले ही
इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था।
पर ऐसा कौन-सा पाप था
जिसकी इतनी बड़ी कीमत उसे चुकानी पड़ी?
अब तो उसके पास कोई वजह भी नहीं बची।
कैसे जिए वह?
और उसे कौन समझाए
कि अब जीने की वजह क्या है?
पति के आकस्मिक निधन के बाद
वह जीना छोड़ चुकी थी।
लोग बार-बार उसकी एकमात्र संतान को
उसके सामने बैठाकर कहते थे
“अब तुम्हें इसके लिए जीना है।”
अब… वह भी नहीं।
मात्र पैंतालीस बसंतों में
जीवन ने उसे ऐसे-ऐसे थपेड़े दिए
माँ, पति और बेटा…
सब एक-एक कर छिन गए।
हृदय विदारक था वह चीत्कार
“अरे मेरा बाबू, मेरा लल्ला!
कहाँ गया तू?
काहे धोखा दिए बाबू?
क्या पाप किए थे हमने?
अब हमें नहीं जीना”
क्या सचमुच
किसी के कर्मों में ही कोई कमी रह जाती है?
फिर भी
तुम्हें जीना होगा।
उठो… उठो हे देवी!
तुम धरती हो।
हर पीड़ा, हर दुख
हृदय में संजोकर भी
तुम जियो।
भगवान ने तुम्हें यूँ ही नहीं रचा—
उठो, जियो।
और हाँ,
जब तुम थोड़ा अपने लिए जीने लगोगी,
जब माथे पर बिंदी सजेगी,
अच्छे वस्त्र पहनोगी,
किसी से दो शब्द बोल लोगी
तो वही लोग,
जो आज रुदाली बने हैं,
कल ताने देंगे।
किन्तु अब!!!
अब चुप नहीं रहना।
अब जीवन से माफी नहीं माँगनी।
अब जीना अपराध नहीं
एक साहस होगा।
ये उन सभी के लिए जिन्होंने असमय
अपने प्रियजनों को खो दिया।
— सविता सिंह मीरा
