बसंत का नशा
बसंत आ गया
पेड़ पौधे सब बौराने लगे
रंग बसंत का कुछ हम पर भी है चढ़ा
बौराये बौराये हम भी फिर रहे
आँखों में छाया है नशा मस्ती का
हर किसी नारी के साथ चहक रहे
जिस तरह कली कली सी खिल रही
हम भी भीतर से वैसे वैसे खिल रहे
नशा बसंत का कुछ ऐसा ही है
सब पीत पीत हो रहे
