कविता – हाँ! मैं उससे प्रेम करता हूँ
मैंने उससे प्रेम
इसलिए नहीं किया
कि उसके चेहरे पर
सौंदर्य का उजास ठहरा था।
मैंने प्रेम किया
उस घायल हृदय से
जिसकी पुकार
अक्सर शब्दों से पहले
आँखों में उतर आती थी।
मैंने देखे
उसके पपड़ाए होंठ—
जिन पर चुप्पी की दरारें थीं,
उसकी खुरदुरी हथेलियाँ—
जिनमें जीवन का सारा बोझ
अनगढ़ ही ठहरा रहा,
और उसकी एड़ियों की बिवाइयाँ—
जिनमें
हर रोज़ का संघर्ष
दरकता रहा।
मैंने सुना उसका रुदन,
और तब जाना—
सौंदर्य
स्त्री का अकेला दुःख नहीं
कि उसी से किया जाए प्रेम।
मैंने प्रेम के लिए चुना
उसके हिस्से का दर्द,
उसकी थकान,
उसकी अनकही हारें।
हाँ,
मैं उससे प्रेम करता हूँ—
उसकी सुंदरता से नहीं,
उसके सच से।
— सन्दीप तोमर
