बाल कहानी – मेले की सीख
स्वर्णा नदी का बहुत पौराणिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। यहाँ प्राचीनकाल से प्रति वर्ष मकर संक्रांति से लेकर वसंत पंचमी तक बड़ा मेला लगता है, जहाँ दूर – दूर से अनेक श्रद्धालु पवित्र स्नान और आनंदोत्सव के लिए आते हैं।इस बार भी लगभग एक महीने की साफ – सफाई और आवश्यक व्यवस्थाओं के बाद नदी के किनारे फैला हुआ रंग-बिरंगा मेला सज चुका है। दूर तक लोगों की कतारें, दोनों ओर दुकानों की चहल-पहल, खिलौनों की खनक, जलेबी की खुशबू और बीच में नदी पर बना एक लंबा पुल… आस्था, उल्लास और उत्सव से सराबोर अपार जनसमूह। दूकानों पर खरीदारों की भीड़ लगी हुई है।
सुबह-सुबह सूरज की सुनहरी किरणें नदी के पानी पर चमक रही थीं। पुल के दोनों ओर तंबुओं की कतारें सजी थीं। कहीं गुब्बारे बिक रहे थे, कहीं मिट्टी के खिलौने, तो कहीं रंगीन चूड़ियाँ।कहीं तमाशे, लोकनृत्य, कथा-भागवत हो रही है. तो कहीं सर्कस, बुकस्टाल, जादूगर, सपेरे और नट दर्शकों को लुभा रहे हैं। खाने – पीने के स्टालों पर लोग विविध व्यंजनों का स्वाद ले रहे हैं।
बारह साल का अभय अपने गाँव हेमपुर से पहली बार इतने बड़े मेले में आया था। उसके साथ उसकी छोटी बहन गुनगुन, माँ सीमा और पिता रमेश भी थे।
अभय ने आँखें फैलाकर कहा-“माँ! देखो, कितना बड़ा मेला है! पूरा पुल लोगों से भरा हुआ है।”
माँ मुस्कुराईं-“हाँ बेटा, लेकिन ध्यान रखना—भीड़ में सावधानी बहुत जरूरी होती है।”
पुल पर चलते-चलते अभय की भेंट मीरा से हुई, जो उसी उम्र की थी। मीरा अपनी दादी का हाथ थामे हुए थी।वह अपने गाँव ढखिया से आई थी।
मीरा बोली-”“तुम भी पहली बार आए हो क्या?”
अभय ने उत्साह से जवाब दिया-“हाँ! मैं तो हर दुकान देखना चाहता हूँ।”
दादी ने स्नेह से कहा-“देखो बच्चो! मेला आनंद के लिए है, पर नियमों के साथ।”
उनकी बात अभय के मन में बैठ गई।
थोड़ी देर बाद बच्चे नदी के किनारे पहुँचे। पानी शांत दिख रहा था, पर बीच-बीच में तेज धार भी थी। पास ही एक सूचना-पट्ट लगा था—‘नदी में कचरा न डालें’।
गुनगुन ने जलेबी का कागज हाथ में पकड़े-पकड़े पूछा-“भैया, इसे कहाँ फेंकूँ?”
अभय ने बोर्ड की ओर इशारा किया-“उधर डस्टबिन है। नदी गंदी हो जाएगी, तो मछलियाँ बीमार पड़ जाएँगी।”
मीरा ने खुश होकर कहा-“मेरी दादी कहती हैं, नदी हमारी दोस्त है।”
गुनगुन बोली – “हाँ, नदी हमारी माता होती है। हमें उसमें गंदगी नहीं डालनी चाहिए। “
तीनों बच्चों ने मिलकर कागज, चिप्स के लिफाफे, टाफी के रैपर, पानी की खाली बोतल आदि डस्टबिन में डाला। छोटे-से काम ने उन्हें बड़ा संतोष दिया।
दोपहर होते-होते पुल पर भीड़ और बढ़ गई। अचानक किसी ने पीछे से धक्का दिया। गुनगुन का हाथ छूटते-छूटते बचा।
माँ घबरा गईं और बोली – “सब लोग पास-पास चलो!”
उसी समय मेले के स्वयंसेवक सीटी बजाते हुए बोले-“कृपया एक ही दिशा में चलें, बच्चों का हाथ न छोड़ें।”
अभय ने देखा कि नियम मानते ही रास्ता साफ होने लगा। उसने मीरा से कहा-“अगर सब नियम मानें, तो मेला और मजेदार हो जाता है।”
मीरा ने सिर हिलाया-“और सुरक्षित भी!”
भीड़ में एक छोटा बच्चा रोता हुआ दिखा। उसके हाथ में गुब्बारे की डोरी थी, पर साथ कोई नहीं।
अभय आगे बढ़ा-“अरे, तुम खो गए हो?”
बच्चे ने सिसकते हुए कहा-“माँ नहीं मिल रही…”
अभय उसे स्वयंसेवक के पास ले गया। माइक पर घोषणा हुई और थोड़ी देर में माँ आ गईं।
माँ ने आभार से कहा-“बेटा, तुमने बहुत अच्छा काम किया।”
गुनगुन फुसफुसाई-“भैया, आज तुम हीरो हो!”
शाम ढलते-ढलते मेले की रोशनी और चमकने लगी। पुल के ऊपर से देखने पर पूरा मेला किसी इंद्रधनुष जैसा लग रहा था।
पिता रमेश बोले-“बच्चों, आज हमने क्या सीखा?”
अभय ने गिनाते हुए कहा,
“भीड़ में सावधानी, नदी की सफाई, नियमों का पालन और जरूरतमंद की मदद।”
मीरा की दादी ने जोड़ा-“और सबसे बड़ी बात—जिम्मेदारी।”
मेले में बच्चों ने झूलों का आनंद लिया। अभय ने बैट – बल्ला, गुनगुन ने गुल्लक और रेलगाड़ी, माँ ने बेंत का मोढ़ा और बिजली की केतली और पिता जी ने एक फोल्डिंग छतरी खरीदी। सभी ने ताजी गर्म जलेबियाँ, बास्केट चाट और तंदूरी चाय का स्वाद लिया। अभय और गुनगुन खुश होकर बोले – वाह! मेले में आकर बड़ा आनंद आया ।
घर लौटते समय अभय ने नदी की ओर देखा। उसे लगा मानो नदी मुस्कुरा रही हो। उसने मन ही मन सोचा—“अगर हम सब मिलकर थोड़ी-सी जिम्मेदारी निभाएँ, तो हर मेला, हर शहर और हर नदी सुरक्षित और सुंदर रह सकती है।”
गुनगुन ने हाँ मे हाँ मिलायी-“अगली बार फिर आएँगे… नियमों के साथ!”
कहानी का संदेश :
यह कहानी हमें सिखाती है कि आनंद और उत्सव तभी सच्चे होते हैं जब हम सुरक्षा, स्वच्छता और जिम्मेदारी को साथ लेकर चलें। चाहे वह मेला हो, नदी हो, विद्यालय हो या हमारा दिन – प्रतिदिन का जीवन।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
