शिक्षा एवं व्यवसाय

ज्ञान, स्क्रीन और संवेदना का संकट

“ज्ञान बढ़ा पर भाव क्या, अब भी मन लाचार”—यह पंक्ति केवल एक दोहा नहीं, बल्कि इक्कीसवीं सदी के मनुष्य की सामूहिक आत्मस्वीकृति है। हमने जितना ज्ञान अर्जित किया है, उतना शायद मानव इतिहास के किसी भी कालखंड में नहीं किया गया। सूचनाएँ उँगलियों पर नाच रही हैं, दुनिया एक छोटे से स्क्रीन में सिमट आई है और विज्ञान ने जीवन को सुविधाओं की पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया है। इसके बावजूद—या शायद इसी कारण—मनुष्य भीतर से पहले से अधिक असहाय, असंतुलित और बेचैन दिखाई देता है। आज का संकट ज्ञान के अभाव का नहीं, बल्कि विवेक, संवेदना और ठहराव के लुप्त होने का संकट है।

स्क्रीन की चकाचौंध ने केवल हमारी आँखों को नहीं, हमारी चेतना को भी प्रभावित किया है। मोबाइल, लैपटॉप और डिजिटल माध्यमों ने सूचना को लोकतांत्रिक तो बनाया, पर सोच को गहराई नहीं दी। हम पहले से कहीं अधिक पढ़ते हैं, पर पहले से कहीं कम समझते हैं। हम देखते बहुत हैं, पर महसूस कम करते हैं। हर पल अपडेट रहना आज सचेत होने की पहचान बन गया है, लेकिन इसी निरंतर अपडेट ने मनुष्य को भीतर से थका और खाली कर दिया है। सोशल मीडिया पर विचार नहीं, प्रतिक्रियाएँ जन्म लेती हैं। वहाँ ठहराव नहीं, केवल तात्कालिक उत्तेजना है। सच और झूठ, गंभीरता और सतहीपन, संवेदना और सनसनी—सब एक ही मंच पर समान महत्व के साथ परोसे जा रहे हैं। ऐसे वातावरण में सत्‌विचार, जो समय, मौन और आत्मसंवाद से उपजते हैं, धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।

आज का मनुष्य ऐसे समय में जी रहा है जहाँ संवाद लगातार हो रहा है, पर संवादहीनता भी उतनी ही गहरी है। मोबाइल के कक्ष में आवाज़ें चिल्ला रही हैं—कॉल, मैसेज, वीडियो, मीटिंग्स, रील्स—हर ओर शोर है। लेकिन इसी शोर के बीच मनुष्य अपने ही भीतर की आवाज़ सुनने की क्षमता खो बैठा है। बाहर की बातचीत बढ़ी है, भीतर का संवाद घटा है। जब भीतर की खामोशी को सुना नहीं जाता, तो वह धीरे-धीरे कुंठा, आक्रोश और असंतुलन में बदल जाती है। आज रिश्तों में बढ़ता तनाव, समाज में बढ़ती असहिष्णुता, ऑनलाइन अपमान और वास्तविक जीवन में बढ़ती असंवेदनशीलता—ये सब उसी अनसुनी खामोशी के लक्षण हैं।

हम बोलना जानते हैं, पर सुनना भूल चुके हैं। न दूसरों की पीड़ा सुन पाते हैं, न अपने मन की बेचैनी को समझ पाते हैं। संवाद की यह विफलता केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक भी है। जब समाज सुनना छोड़ देता है, तो असहमति शत्रुता में बदल जाती है और विचार विमर्श के स्थान पर टकराव जन्म लेता है।

विज्ञान ने निस्संदेह मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएँ दी हैं। रोगों पर नियंत्रण, संचार की गति, यात्रा की सरलता और उत्पादन की क्षमता—इन सब क्षेत्रों में विज्ञान ने क्रांति की है। लेकिन इसी विज्ञान से यह अपेक्षा भी जुड़ी थी कि वह मनुष्य को अधिक संतुलित, अधिक संवेदनशील और अधिक जिम्मेदार बनाएगा। दुर्भाग्यवश, ऐसा नहीं हुआ। विज्ञान ने हमें शक्ति दी, पर संयम नहीं सिखाया। गति दी, पर विराम नहीं। साधन दिए, पर मर्यादा नहीं।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं, बल्कि यह है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। तकनीक हमें आगे बढ़ने के असंख्य रास्ते दिखाती है, पर यह नहीं बताती कि कब रुकना है। यह निर्णय विवेक करता है, और विवेक का विकास मशीनों से नहीं, मानवीय मूल्यों से होता है।

हमने ज्ञान को केवल संग्रहण तक सीमित कर दिया है। डिग्रियाँ बढ़ीं, पर दृष्टि संकुचित होती गई। विशेषज्ञता बढ़ी, पर समग्र समझ घटती चली गई। आज का शिक्षित व्यक्ति भीड़ में शामिल होने में तेज़ है, पर अकेले खड़े होकर सच बोलने में हिचकता है। यह शिक्षा का नहीं, सूचना के बोझ का परिणाम है। ज्ञान जब संवेदना से कट जाता है, तो वह अहंकार बन जाता है। तकनीक जब विवेक से कट जाती है, तो वह नियंत्रण के बजाय वर्चस्व का साधन बन जाती है।

इस स्थिति का समाधान तकनीक को नकारने में नहीं, बल्कि उसे मानवीय मूल्यों के अधीन रखने में है। स्क्रीन से भागना संभव नहीं, पर उसके सामने नतमस्तक होना भी अनिवार्य नहीं। हमें फिर से मौन का महत्व समझना होगा। हमें संवाद को केवल बोलने की प्रक्रिया नहीं, सुनने की कला बनाना होगा। ज्ञान को आत्मचिंतन से जोड़ना होगा और विज्ञान को नैतिकता के साथ संतुलित करना होगा।

परिवार, शिक्षा और समाज—तीनों स्तरों पर यह पुनर्संरचना आवश्यक है। बच्चों को केवल स्मार्ट नहीं, संवेदनशील बनाना होगा। शिक्षा को केवल प्रतिस्पर्धा का मैदान नहीं, बल्कि मानवीय विकास का माध्यम बनाना होगा। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि गति के साथ ठहराव भी उतना ही आवश्यक है।

आज आवश्यकता किसी नए आविष्कार की नहीं, बल्कि पुरानी मानवीय समझ की पुनर्स्थापना की है। तकनीक हमारे जीवन का साधन बने, लक्ष्य नहीं। संवाद शोर नहीं, सेतु बने। और ज्ञान केवल बढ़े नहीं, मनुष्य को बेहतर बनाए। यदि हम यह संतुलन नहीं बना पाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद अत्यंत उन्नत होंगी—पर भीतर से और भी अधिक लाचार।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

*डॉ. सत्यवान सौरभ

✍ सत्यवान सौरभ, जन्म वर्ष- 1989 सम्प्रति: वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार ईमेल: satywanverma333@gmail.com सम्पर्क: परी वाटिका, कौशल्या भवन , बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045 मोबाइल :9466526148,01255281381 *अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में समान्तर लेखन....जन्म वर्ष- 1989 प्रकाशित पुस्तकें: यादें 2005 काव्य संग्रह ( मात्र 16 साल की उम्र में कक्षा 11th में पढ़ते हुए लिखा ), तितली है खामोश दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन प्रकाशन- देश-विदेश की एक हज़ार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन ! प्रसारण: आकाशवाणी हिसार, रोहतक एवं कुरुक्षेत्र से , दूरदर्शन हिसार, चंडीगढ़ एवं जनता टीवी हरियाणा से समय-समय पर संपादन: प्रयास पाक्षिक सम्मान/ अवार्ड: 1 सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन पुरस्कार हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी 2004 2 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड काव्य प्रतियोगिता प्रोत्साहन पुरस्कार 2005 3 अखिल भारतीय प्रजापति सभा पुरस्कार नागौर राजस्थान 2006 4 प्रेरणा पुरस्कार हिसार हरियाणा 2006 5 साहित्य साधक इलाहाबाद उत्तर प्रदेश 2007 6 राष्ट्र भाषा रत्न कप्तानगंज उत्तरप्रदेश 2008 7 अखिल भारतीय साहित्य परिषद पुरस्कार भिवानी हरियाणा 2015 8 आईपीएस मनुमुक्त मानव पुरस्कार 2019 9 इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च एंड रिव्यु में शोध आलेख प्रकाशित, डॉ कुसुम जैन ने सौरभ के लिखे ग्राम्य संस्कृति के आलेखों को बनाया आधार 2020 10 पिछले 20 सालों से सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुडी कई संस्थाओं और संगठनों में अलग-अलग पदों पर सेवा रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 9466526148 (वार्ता) (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) 333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan, Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045 Contact- 9466526148, 01255281381 facebook - https://www.facebook.com/saty.verma333 twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh