डिजिटल कठपुतली
चमकती स्क्रीन के सम्मोहन में,
हर पल खुद को खोता है,
तकनीक की अदृश्य डोरियों से,
अब इंसान संचालित होता है।
जेब में रखा वो छोटा सा ‘स्मार्टफोन’,
उंगलियों पर सबको नचाता है,
कभी सूचनाओं का शोर बनकर,
मन का सुकूँ निगल जाता है।
दोस्त हज़ारों हैं ‘आभासी’ दुनिया में,
पर अपनों से नाता टूटता जाता है,
लगा के चेहरे पर ‘फ़िल्टर’ की परत,
अब वो असलियत से भागता जाता है।
कठपुतली नहीं था इंसान कभी,
पर अब वो ‘डेटा’ का गुलाम है,
एक ‘नोटिफिकेशन’ की छोटी दस्तक पर ,
रुक जाता ज़रूरी काम है।
बुद्धि को मुट्ठी में भींचने का काम,
‘ए.आई’ ने खूब निभाया है,
कॉपी-पेस्ट की आदत ने,
रचनात्मकता का गला दबाया है।
लाइक-कमेंट की भीख में जैसे,
अस्तित्व अधूरा रह जाता है,
इंसान होने का गुमान था जिसे,
आज वो ‘डिजिटल कठपुतली’ कहलाता है।
— अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
