कविता

जाने न दूंगी

ज़िम्मेदारी निभानी पड़ेगी,ऐसे तुम्हें जाने न दूंगी।
आज कम है तो क्या ग़म,हर पथ पे संग चलूंगी।

दुल्हन सी मैं सजी हूँ अब भी महावर है पैरों में,
जीवनसाथी हूँ तुम्हारी क्यों गिनते मुझे गैरों में।

रूको ,सुनो तुम यूँ ऐसे तन्हां यहाँ जाओगे,
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर संग मुझे भी पाओगे।

टूटी गर चप्पल तुम्हारी, मैं नंगे पांव आऊंगी।
तुम्हारे कदमों के पीछे कदम अपने बढ़ाऊंगी।

हम मिलकर ज़िन्दगी को,इतना हसीन बनाएंगे।
अपने पग के कटंक चुन,बस फूलो से सजाएंगे।

तुम हो मेरे हमसफ़र गर्व से सबको बताऊंगी।
तुम्हारे पांव के छालों पे ,प्रेम का मरहम लगाऊंगी।

— कामनी गुप्ता

कामनी गुप्ता

माता जी का नाम - स्व.रानी गुप्ता पिता जी का नाम - श्री सुभाष चन्द्र गुप्ता जन्म स्थान - जम्मू पढ़ाई - M.sc. in mathematics अभी तक भाषा सहोदरी सोपान -2 का साँझा संग्रह से लेखन की शुरूआत की है |अभी और अच्छा कर पाऊँ इसके लिए प्रयासरत रहूंगी |