कविता

संत्रास

अब संत्रास विश्व में आया।
डरा रहा है युद्धक साया।।
पड़ जाए ना डर ये भारी।
सबकी दिखती है तैयारी।।

विश्व भला क्या झेल सकेगा।
या दामन बारूद भरेगा।।
आज सभी हैं डर में जीते।
एक -एक दिन कैसे बीते।।

मानवता पर पड़े न भारी।
निष्ठुर करते गोलाबारी।।
इनकी उनकी सब तैयारी।
निज विनाश की लीला न्यारी।।

इक दूजे को हैं धमकाते।
मुस्काते दिखते सकुचाते।।

रिश्ते नाते भूल गए हैं।
रार सभी के नए-नए हैं।।
उजड़ रहे परिवार घराने।
इसके पीछे नए बहाने।।

प्रभु जी अब कुछ आप कीजिए।
बर्बादी से बचा लीजिए।।
जीत हार की चिंता भारी।
दुनियाँ चाह रही तव यारी।।

आने वाला संकट भारी।
तुम भी अब कर लो तैयारी।।
या फिर कोई राह दिखाओ।
आकर मुझमें आप समाओ।।

कैसे भी संत्रास मिटाओ।
काले बादल आप भगाओ।।
साँस चैन की लेगी दुनियाँ।
मुस्काएगी जग की मुनियाँ।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921