सामाजिक

एक जिम्मेदार समाज के रूप में विफल हो रहे हैं हम

हम बात करते हैं एक सभ्य, लोकतांत्रिक और संवेदनशील समाज की — ऐसा समाज जो अपने सदस्यों के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा की रक्षा करता है। सवाल यह है कि क्या हम वास्तव में एक जिम्मेदार समाज हैं? क्या हमारे सामाजिक ढाँचे महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों को वह सुरक्षित वातावरण प्रदान कर पा रहे हैं जिसका हर नागरिक हकदार है?

दुर्भाग्य से उपलब्ध सरकारी आंकड़े और प्रामाणिक शोध रिपोर्टें बताते हैं कि बड़े दावों के बावजूद हम कई मूलभूत सामाजिक ज़िम्मेदारियों में लगातार विफल रहे हैं। इन विफलताओं का परिणाम केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं रहा, बल्कि समाज की नैतिकता, न्याय व्यवस्था और राष्ट्रीय विकास की प्रगति भी प्रभावित हुई है।

सबसे पहले हमें महिलाओं की सुरक्षा की वास्तविकता का आंकड़ात्मक परिदृश्य समझना होगा। राष्ट्रिय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2023 में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या लगभग 4,48,211 थी, जो पिछले वर्षों की तुलना में बढ़त दर्शाती है और यह दशकों में सबसे अधिक दर्ज अपराधों में से एक रही है। यह कोई छोटी संख्या नहीं है; इसका अर्थ है कि हर दिन औसतन 1,200 से अधिक महिलाएँ अपराध की शिकार हो रही हैं—घरेलू हिंसा, यौन अपराध, छेड़छाड़, अपहरण या फ़िर अन्य किसी प्रकार की शारीरिक/मानसिक उत्पीड़न की परिस्थिति में। इस संख्या की भयावहता तभी स्पष्ट होती है जब हम यह जानते हैं कि घरेलू हिंसा और पति/संबंधियों द्वारा क्रूरता जैसे अपराध कुल मामलों का अधिकतर हिस्सा हैं।

इतना ही नहीं, एनसीआरबी के अनुसार लंबित मामलों की संख्या भी बड़े स्तर पर हाई बनी हुई है, जिसका मतलब है कि दर्ज मामलों का निपटारा सुचारू रूप से नहीं हो रहा। ऐसे में पीड़ित को न्याय मिलने में वर्षों लग सकते हैं या कभी न मिलता हो—जिससे न्याय प्रणाली पर लोगों का विश्वास भी कम होता है। यह स्थिति अकेले कानून-व्यवस्था की कमी नहीं है; यह हमारे सामाजिक ढाँचे की विफलता है। जब महिलाएँ घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं और सार्वजनिक स्थानों पर भी भय का अनुभव करती हैं, तो यह हमारी सामाजिक संस्कृति और मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लगाता है। एक व्यापक सर्वेक्षण में पाया गया है कि शहरी क्षेत्र की लगभग 40 प्रतिशत महिलाएँ असुरक्षित महसूस करती हैं—चाहे वह सड़क पर अकेले चलना हो, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग हो या रात के समय बाहर होना हो। यह आंकड़ा इस भ्रम को उजागर करता है कि “महिला सुरक्षा” केवल पुलिस या कानून बनाने तक सीमित है—वास्तव में यह आत्मनिर्भरता, सामुदायिक समर्थन, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और सामाजिक सम्मान की ताकत से जुड़ा मुद्दा है।

महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के प्रति समाज के अंतरतम सांस्कृतिक दृष्टिकोण का विश्लेषण करना भी आवश्यक है। अक्सर हम सुनते हैं कि महिला सुरक्षा के कानून कड़े होने चाहिए, पुलिस को सजग होना चाहिए, और सामाजिक शिक्षा ज़रूरी है। लेकिन वास्तविकता यह है कि लैंगिक रूढ़िवादिता और सामाजिक मान्यताएँ महिलाओं को नीचे दृष्टि से देखती हैं, जिससे अपराध की जड़ें गहरी होती हैं। जब घरों में माता-पिता बेटियों को सीमित गतिविधियों की सलाह देते हैं, जब समुदाय “शर्म” या “परिवार की इज्जत” के नाम पर पीड़िता के लिए चुप्पी का दबाव बनाता है, तब हम एक जिम्मेदार सोच वाले समाज की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?

और यह समस्या केवल महिलाओं तक ही सीमित नहीं है। बच्चों के खिलाफ भी देश में अपराधों की संख्या चिंताजनक स्तर पर है। NCRB डेटा बताता है कि बच्चों के खिलाफ अपराधों में भी 9.2% से अधिक वृद्धि हुई है, जिसमें यौन अपराध और अपहरण जैसी गंभीर श्रेणियाँ शामिल हैं। यह प्रभावित करता है कि हमारा समाज बच्चों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता नहीं दे रहा है—यह एक दोषपूर्ण सामाजिक संरचना को दिखाता है जो कमजोर वर्गों की रक्षा नहीं कर पा रही है।

जब हम इन आंकड़ों की तुलना हमारी संवैधानिक मंशा से करते हैं, तब अंतर्द्वंद्व और भी स्पष्ट होता है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को सम्मान के साथ जीने और समान सुरक्षा का अधिकार देता है। लेकिन आंकड़े यह दिखाते हैं कि यह अधिकार अक्सर केवल कागज़ों पर ही है। यदि अपराध दर इतनी अधिक है और पीड़ितों का न्याय मिलने में इतनी देरी होती है, तो क्या समाज की प्राथमिक ज़िम्मेदारी—सुरक्षा यह व्यवस्था—वास्तव में पूरी हो पा रही है? तथ्य यही दर्शाते हैं कि हमारी सामाजिक संरचना उन मूलभूत सिद्धांतों को लागू नहीं कर पा रही है जिनकी हम घोषणा करते हैं।

इस विफलता की एक और महत्वपूर्ण मिसाल बाल विवाह और सामाजिक प्रथाएँ हैं। भारत में बाल विवाह अभी भी एक गंभीर सामाजिक समस्या है। एक स्वतंत्र शोध विश्लेषण बताता है कि हर मिनट लगभग तीन लड़कियाँ बाल विवाह की स्थिति में होती हैं, और 2022 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 4,442 बाल विवाह प्रति दिन हुए थे—जबकि केवल एक अत्यंत न्यून्य संख्या की पंजीकृत शिकायतें ही न्यायालयों तक पहुँचती हैं। यह स्थिति उस सामाजिक चेतना की कमी को दर्शाती है जहाँ बच्चों के अधिकारों की रक्षा नितांत आवश्यक है लेकिन समाज इस गम्भीर सामाजिक बुराई को रुकने नहीं दे रहा।

इन गंभीर सामाजिक समस्याओं के बावजूद अक्सर समाज का ध्यान सिरे से प्रगति या विकास के अन्य अनेक दावों पर केंद्रित होता है—जैसे आर्थिक वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट सिटी आदि। हालांकि ये सभी क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब महिला सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा जैसी मौलिक मानवाधिकारों की स्थिति चिंताजनक हो, तो यह दिखाता है कि हम अपनी जिम्मेदार सामाजिक प्राथमिकताओं को संतुलित नहीं कर रहे हैं। एक जिम्मेदार समाज वह होता है जो प्रगति के साथ मानव गरिमा, सम्मान और जीवन की सुरक्षा को भी उच्च प्राथमिकता दे।

वास्तव में, जब एक समाज में भरोसा, सम्मान और सुरक्षा दायरा कमजोर होता है, तो यह सरकार, पुलिस या संस्थागत नीतियों की कमजोरी नहीं बनकर समाज की स्वयं की प्रतिक्रियात्मक और संरचनात्मक विफलता बन जाती है। उदाहरण के लिए जब हम यह देखते हैं कि कानून मौजूद हैं—जैसे घरेलू हिंसा अधिनियम, कैंसर की रोकथाम कार्यक्रम, बाल संरक्षण कानून, या महिलाओं के खिलाफ दहेज हत्या के लिए पैनल—तब भी न्यायपालिका में लंबित मामलों की प्रचण्ड मात्रा और कम सज़ा दर के कारण ऐसे कानून अपनी पूर्ण क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। इस बात से यह भी स्पष्ट होता है कि न केवल समाज का व्यवहार ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि हमारी न्याय और कार्यान्वयन तंत्र की प्रतिक्रिया भी अपर्याप्त रही है।

समाज की असफलता का एक और उदाहरण महिला सुरक्षा की अनुभूति है। राश्ट्रीय और स्थानीय स्तर के सर्वेक्षण बताते हैं कि कई महिलाएँ सार्वजनिक स्थानों और परिवहन में अकेले यात्रा करते समय असुरक्षित महसूस करती हैं। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का परिचायक है—जब तक महिलाएँ रोशनी, भीड़-भाड़ या पुलिस सुरक्षा को लेकर भय महसूस करेंगी, तब तक हम ज़िम्मेदार समाज के दावे कैसे कर सकते हैं? जानबूझकर, यह केवल पुलिस कार्यक्षमता की समस्या नहीं है, बल्कि सार्वजनिक वातावरण की डिज़ाइन, सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक मान्यताओं की प्रतिक्रिया भी है।”

इन तथ्यों को समझते हुए प्रश्न बनता है: हम इस असफलता के मूल कारण क्यों नहीं पहचान पा रहे हैं? इसका एक बड़ा कारण यह है कि सामाजिक बदलाव केवल कानून या संस्थागत सुधारों से नहीं आ सकते; यह हमारी विश्व दृष्टि, मानसिकता, शिक्षा और पारिवारिक मूल्य प्रणाली से जुड़ा है। जब माता-पिता बेटियों को घर के अंदर सीमित रखते हैं, जब परिवार या समुदाय पीड़ितों को चुप रहने की सलाह देते हैं, और जब समाज अपराधियों को न तो रोकता है और न ही पुनर्वास का सही अवसर देता है—तो यह एक ऐसी सामाजिक विफलता है जिसे केवल कानून से ठीक नहीं किया जा सकता।

वास्तव में, एक जिम्मेदार समाज उन्हीं मूल्यों पर परखा जाता है जिनका प्रत्यक्ष प्रभाव उसके कमजोर और संवेदनशील सदस्यों की ज़िंदगी पर पड़ता है। यदि समाज में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, सम्मान, स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसरों को संरक्षित करने के लिए वह सशक्त, संगठित और संवेदनशील पहल नहीं कर रहा—तो हम स्वयं को दोषमुक्त नहीं कह सकते। आज की वास्तविकता यह है कि हम केवल व्यापक शब्दों और दावे में व्यस्त हैं, लेकिन नैतिकता, कार्रवाई और सामाजिक समर्थन ढाँचे की कमी ने हमें “एक जिम्मेदार समाज” होने से रोका हुआ है।

इसलिए, यह कहना उचित होगा कि हम एक जिम्मेदार समाज के रूप में विफल हो रहे हैं—वह जिम्मेदारी जो हमारे नागरिकों की सुरक्षा, गरिमा और नैतिक सम्मान को सुनिश्चित कर सके।

— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330