कविता

हे प्रिये !

हे प्रिये!
प्रेम कितना सुंदर है
इसमें मृत्यु भी दुःख नहीं देती
कांटे फूल बन जाते हैं
और शैतान भगवान बन जाते हैं ।

हे प्रिये !
प्रेम वो मरहम है
जो बड़े से बड़े घाव को भर देता है
शत्रु को दोस्त बना देता है ।

हे प्रिये !
प्रेम ने पत्थर को पिघलाकर
पानी बना दिया
टूटी- फूटी झोपड़ियों में
महलों का सुख भर दिया।

हे प्रिये !
प्रेम कड़ी धूप में मीठी छाॅंव है
अनजानेपन में भी अपनापन है
हर मर्ज की दवा प्रेम है ।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111