“मैं गीतों की जादूगरनी” प्रेमात्मक गीतावली

“मैं गीतों की जादूगरनी” सचमुच अपने शीर्षक को पूर्णतः सार्थक करने वाला काव्य-संग्रह है। कवयित्री शैलजा सिंह बाबा गोरखनाथ की धरती से अपनी साहित्यिक यात्रा प्रारम्भ करते हुए वैवाहिक जीवन भगवान बुद्ध और भगवान महावीर की पावन भूमि बिहार से निकलकर वर्तमान में गाज़ियाबाद में रहते हुए अपनी साहित्य-साधना को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा रही हैं, उनकी लेखनी में अद्भुत आत्मीयता और संवेदनशीलता है।
यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि भावनाओं की मधुर धारा है, जिसमें प्रेम, विरह, जीवन-संघर्ष, प्रकृति-सौंदर्य, सामाजिक चेतना और नारी-अस्मिता एक साथ प्रवाहित होते हैं। प्रेम और स्मृति की मधुर छाया जैसी रचना “प्रियतम की याद सताए”, “सिरहाने थी याद तुम्हारी”, “तन में सावन मन में सावन”, “वो याद बहुत आते हैं” जैसी रचनाएँ प्रेम की कोमल अनुभूतियों से परिपूर्ण हैं। विरह की वेदना यहाँ बोझिल नहीं, बल्कि मधुर स्मृति बनकर उभरती है। कवयित्री ने प्रेम को आत्मिक और पवित्र अनुभूति के रूप में चित्रित किया है। जीवन-संघर्ष और आशा की ज्योति भरी “दर्द जब हद से बढ़े”, “हौसला जिसका टूटा, निखरता नहीं”, “बिखरा-बिखरा तिनका जोड़ा”, “हम रौशनी की ज़िद लिए” जैसी कविताएँ संघर्ष के बीच भी आशा का दीप प्रज्वलित करने का संदेश देती हैं। कवयित्री का विश्वास है कि टूटन अंत नहीं, बल्कि नव-निर्माण का आरंभ है। सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदना से मिला “एक मज़दूर ने हँस के मुझसे कहा”, “जीवन इतना महँगा है”, “व्यक्ति के दुखड़े बहुत हैं”, “जो औरों की खातिर जीता” जैसी रचनाएँ समाज की यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। इनमें करुणा, सहानुभूति और मानवता के प्रति गहरा विश्वास झलकता है। कवयित्री सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की कामना करती हैं। प्रकृति और गाँव की स्मृतियाँ मे घुली “नदी किनारे वाला गाँव”, “कलकल नदिया बहती है”, “रोज़ सिखाती है चिड़िया” जैसी कविताएँ प्रकृति के सौंदर्य और ग्रामीण जीवन की सहजता का सुंदर चित्र प्रस्तुत करती हैं। इनमें मिट्टी की सोंधी महक, बचपन की स्मृतियाँ और सरल जीवन की मधुर छवि सजीव हो उठती है। नारी-अस्मिता और आत्मविश्वास से परिपूर्ण “माँ हो तो घर, घर होता है”, “मैं नए दौर की नारी हूँ”, “जादूगरनी हूँ मैं” जैसी रचनाओं में स्त्री-स्वाभिमान, आत्मबल और सृजन-शक्ति का प्रभावी स्वर है। कवयित्री ने नारी को कोमलता और दृढ़ता दोनों का संतुलित रूप प्रदान किया है। इस संग्रह की भाषा सरल, मधुर और गीतात्मक है। प्रत्येक कविता में सहज लय और भावों की स्वाभाविकता दिखाई देती है। शब्दों का चयन इतना सरल है कि पाठक बिना किसी कठिनाई के भाव-जगत में प्रवेश कर जाता है।
समग्र निष्कर्ष
अतः “मैं गीतों की जादूगरनी” एक हृदयस्पर्शी, सरस और प्रेरणादायी काव्य-संग्रह है। यह पाठकों को प्रेम की मधुरता, जीवन की सच्चाइयों और आशा की उजली किरण से परिचित कराता है। शैलजा सिंह की लेखनी में संवेदना की सच्चाई और भावों की गहराई है। यह संग्रह उन सभी पाठकों के लिए उपयुक्त है, जो गीतात्मक काव्य में जीवन के विविध रंगों का रसास्वादन करना चाहते हैं।
समीक्षक : -रूपेश कुमार
पुस्तक – मैं गीतों की जादूगरनी
विद्या – गीत संग्रह
लेखिका – शैलजा सिंह
प्रकाशक – डायमंड बुक्स, दिल्ली
