दोहे फागुन के
फागुन आया देह में,जागी आज उमंग।
मन उल्लासित हो गया,फड़क उठा हर अंग।।
फागुन लेकर आ गया,प्रीति भरा संदेश।
जियरा को जो दे रहा,मिलने का आवेश।।
फागुन की अठखेलियाँ,होली का पैग़ाम।
हर कोई लिखने लगा,चिठिया प्रिय के नाम।।
फागुन की मदहोशियाँ,छेड़ें मीठी तान।
हल्का जाड़ा कर रहा,अनुबंधों का मान।।
सरसों में आकर्ष है,महुये में है काम।
पवन नेह ले कर रहा,कर्म आज अविराम।।
फागुन लिए तरंग है,सबकी बदली चाल।
मौसम ने ऐसा किया,कुछ तो आज कमाल।।
बहके-बहके लोग हैं,संयम रहा न आज।
फागुन करने लग गया,हर दिल पर तो राज।।
फागुन रंगारंग है,बजें आज तो चंग।
संतों के मन भी चढ़ा,साहचर्य का रंग।।
यौवन है हर भाव पर,टूटे सारे बंध।
है स्वच्छंद मधुमास अब,अवमानित सौगंध।।
— प्रो. शरद नारायण खरे
