गीत/नवगीत

होली पर्व मनाएँ

आओ! मिलकर रंग लगाएँ, प्रेम – सुधा बरसाएँ।
सोल्लास शुचि परम्परा से, होली पर्व मनाएँ।

नवसस्येष्टि यज्ञ करें हम, बाँटें दिव्य प्रसाद।
दीन – दुखी के दुर्दिन काटें, छा जाए आह्लाद।
आनंदित हो झूमें – नाचें, फाग रसीले गाएँ।
सोल्लास शुचि परम्परा से, होली पर्व मनाएँ।

राग – द्वेष की धूल झाड़कर, मुख पर हँसी विखेरें।
मलें अबीर – गुलाल सुवासित, प्रिय मित्रों को घेरें।
आशाओं के फूल खिलाएँ, सपनों को महकाएँ।
सोल्लास शुचि परम्परा से, होली पर्व मनाएँ।

स्नेह से अभिसिंचित कर जीवन, नव हरीतिमा भर दें।
नव विकास की स्वरलहरी से, कण – कण झंकृत कर दें।
जाति – पाँति के भेद मिटाकर, एक रंग हो जाएँ।
सोल्लास शुचि परम्परा से, होली पर्व मनाएँ।

सभी परस्पर मिलें गले, दें मंगलमयी बधाई,
समता – समरसता के आँगन, बाजे सुख – शहनाई,
आदरभाव से गुझिया – पापड़, खाएँ और खिलाएँ।
सोल्लास शुचि परम्परा से, होली पर्व मनाएँ।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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