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सामाजिक सुरक्षा में भारत की छलांग : समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम

भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज ने पिछले दशक में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जो राष्ट्र के समावेशी विकास के एजेंडे में एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन है। यह परिवर्तन साहित्यिक दावे या दार्शनिक चिंतन नहीं है, बल्कि ताज़ा, प्रमाणिक और सरकारी डेटा पर आधारित वास्तविक प्रगति का परिणाम है। सामाजिक सुरक्षा वह ढांचा है जिसके अंतर्गत प्रत्येक नागरिक—विशेषकर कमजोर और वंचित वर्ग—को आर्थिक संकट, बीमारी, दुर्घटना, वृद्धावस्था, बेरोज़गारी जैसी अनिश्चितताओं से लड़ने में सहायता दी जाती है। इसका विस्तृत कवरेज केवल एक कल्याणकारी नीति का संकेत नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदार और समावेशी समाज की पहचान भी है।

2025 की नेशनल इंडिकेटर फ्रेमवर्क (NIF) प्रगति रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2016 के लगभग 22% सामाजिक सुरक्षा कवरेज से 2025 में बढ़कर 64.3% तक पहुंच गया है। अर्थात्, अब लगभग 64.3% भारतीय नागरिक किसी न किसी सामाजिक सुरक्षा लाभ के दायरे में हैं — जो 9 साल पहले केवल एक-पाँचवे हिस्से (1/5) के आसपास था। इस रिपोर्ट में 94 करोड़ से अधिक भारतीयों को सामाजिक सुरक्षा लाभार्थी के रूप में कवर बताया गया है, जो अपने आप में एक बड़ा उपलब्धि है। यह प्रगति सिर्फ आंकड़ों की संख्या नहीं है, बल्कि वास्तविक जीवन के स्तर पर वृद्धावस्था पेंशन, बाल सुरक्षा योजनाएँ, स्वास्थ्य सहायता, कौशल विकास, बेरोज़गारी बीमा, मातृत्व लाभ, सामाजिक सहायता और प्रतिकूल समय में आर्थिक सहायता तक लोगों को जोड़ने का प्रतिफल है। सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तारण केवल एक सरकारी लक्ष्य नहीं रहा, बल्कि यह आधुनिक भारतीय समाज में कमजोर वर्गों तक अधिकार-आधारित सेवाओं की पहुँच को मजबूत करने की दिशा में बढ़ा कदम भी है।

पहले यह कवरेज कई कारणों से सीमित था—जैसे पहचान की समस्या, स्थानीय प्रशासन की क्षमता का अभाव, जागरूकता की कमी, और योजनाओं के लाभार्थी तक पहुँच में बाधाएँ। परंतु अब सूचना प्रौद्योगिकी, आधार-आधारित लाभ वितरण, बैंकिंग समावेशन और मोबाइल नेटवर्क के विस्तार जैसे कारकों ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन को सहज और व्यापक बनाया है। सामाजिक सुरक्षा कवरेज बढ़ने का सीधा सकारात्मक प्रभाव गरीबी में कमी के रूप में भी देखने को मिला है। एसडीज़ 2025 प्रगति रिपोर्ट के अन्य आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि चरम गरीबी की दर में 2011-12 के 27.1% से घटकर 2022-23 में लगभग 5.3% हो गई है, जो सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क के विस्तार और गलतियों से सुरक्षा उपायों के प्रभाव का संकेत है।

हालाँकि कवरेज में वृद्धि सकारात्मक है, परंतु गुणवत्ता, प्रभावशीलता और एकरूपता जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभार्थी तक प्रभावी पहुंच होना आवश्यक है—न कि सिर्फ नामांकन या रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों तक सीमित रहना चाहिए। वहीं वास्तविक जीवन में कुछ वर्ग ऐसे हैं जिन्हें अब भी सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क के बाहर रहने की समस्या झेलनी पड़ती है, जैसे कि असंगठित क्षेत्र के मजदूर, प्रवासी श्रमिक, और बिना स्थिर पते वाले परिवार। एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में बेरोज़गारी की स्थिति को देखें तो दीर्घकालिक बेरोज़गारी दर और युवा बेरोज़गारी अभी भी चिंता का विषय हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की तुलना में भारत में बेरोज़गारी दर में गिरावट के बावजूद यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हालाँकि सरकारी नौकरी सृजन और कौशल विकास योजनाएँ लागू हैं, रोज़गार की गुणवत्तापूर्ण उपलब्धता, नए उद्योगों में अवसरों की कमी तथा उच्च कौशल प्रशिक्षण की आवश्यकता जैसी चुनौतियाँ अभी भी बरक़रार हैं। यही कारण है कि सामाजिक सुरक्षा का कवरेज आवश्यक है—न केवल राजकोषीय सहायता के रूप में, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और अवसरों की समावेशिता के संदर्भ में भी।

भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज संख्या में वृद्धि सामाजिक न्याय के सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (SDGs) की दिशा में भी एक सकारात्मक संकेत है। SDG 1 का लक्ष्य “कोई भी व्यक्ति गरीब न रहे” तथा SDG 10 का लक्ष्य “असमानता में कमी” करना है—इन लक्ष्यों की प्रगति के मापक संकेतक के रूप में सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार उल्लेखनीय मायने रखता है। हालाँकि निरंतर निगरानी और सुधार आवश्यक है, परंतु यह आवश्यक है कि हम इस उपलब्धि को सामाजिक उपलब्धि के रूप में पहचानें। सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तारण अर्थ केवल एक सरकारी कार्यक्रम का विस्तार नहीं है; यह राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास का संकेत भी है—जहाँ व्यक्ति को यह आश्वासन मिलता है कि विपरीत समय में वह अकेला नहीं है।

इसके साथ ही यह भी देखा गया है कि सामाजिक सुरक्षा कवरेज के फैलने से महिला-केंद्रित योजनाओं और वंचित समुदायों के कार्यक्रमों की पहुँच भी बेहतर हुई है, जिससे समाज में समावेशन का भाव मजबूत हुआ है। इससे समुदायों में सामाजिक स्थिरता और सुरक्षा का वातावरण बढ़ता है, जो सामाजिक विभाजन को कम करने में मदद करता है।

अब यह आवश्यक है कि सामाजिक सुरक्षा कवरेज को स्थायी और प्रभावी बनाने के लिए आगे के कदम उठाए जाएँ, जैसे: पढ़ी-लिखी जागरूकता: नागरिकों को अपनी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अधिकार, आवेदन प्रक्रिया और शिकायत निवारण तंत्र की जानकारी का प्रसार किया जाए। डेटा-आधारित लक्ष्य-निर्धारण: लाभार्थियों के वास्तविक समय-डेटा के आधार पर कवरेज के पैमाने और प्रगति की समीक्षा की जाये। स्थानीय सरकारी भागीदारी: पंचायत, नगरीय निकाय तथा राज्य प्रशासन को स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर योजनाओं के अनुकूल कार्यान्वयन करके लाभार्थियों को जोड़ा जाना चाहिए। कौशल और रोजगार समावेशन: केवल सुरक्षा कवरेज पर निर्भर न रहकर रोजगार सृजन और कौशल प्रदान करने पर भी प्रभावी प्रयास किए जाएँ ताकि दीर्घकालिक आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हो सके।

भारत में सामाजिक सुरक्षा कवरेज का यह अभूतपूर्व विस्तार आज एक महत्वपूर्ण सामाजिक उपलब्धि के रूप में उभरा है, पर यह केवल एक प्रारंभिक चरण है। इसके फायदे वास्तविक जीवन में तभी लाभकारी होंगे जब इसका क्रियान्वयन गुणवत्ता, प्रभाव और मानव गरिमा के दृष्टिकोण से भी संतुलित रहे। इस उपलब्धि पर गर्व के साथ यह जरूरी भी है कि हम सामाजिक सुरक्षा को अधिकार, कर्तव्य और संवैधानिक प्रतिबद्धता के रूप में देखें। तभी भारत वास्तव में समावेशी, न्यायसंगत और संवेदनशील राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा—जहाँ प्रत्येक नागरिक के जीवन की सुरक्षा, सम्मान और गरिमा सुनिश्चित हो सके।

— पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला

संस्थापक-निदेशक न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन’ एवं अदम्य ग्लोबल फाउंडेशन ईमेल: Founder@SrijanSansar..com मोबाइल: +91-9312053330