लघुकथा

लघु कथा – मूर्तिकार

एक महान मूर्तिकार जो पत्थर से भगवान की बहुत सुंदर मूर्तियां बनाता था, उसे प्रभु ने स्वप्न में दर्शन दिए और उससे पूछा, मेरे प्रिय मूर्तिकार, तुम पत्थर से इतनी सुंदर-सुंदर भगवान की मूर्तियां कैसे बना लेते हो, उस मूर्तिकार ने बहुत ही बुद्धिमत्ता से भगवान को उत्तर दिया, हे भगवान प्रणाम, मैं मूर्ति नहीं बनाता, मूर्ति तो पत्थर में पहले से ही विद्यमान रहती है, मैं तो केवल जो ऊपर का फालतू पत्थर है उसे हटाता हूं, और भगवान की मूर्ति प्रकट हो जाती है। भगवान उसके इस उत्तर से बहुत ही प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद और वरदान दिया कि तुम जीवन में इससे भी अच्छी भगवान की मूर्तियां बनाकर अपना बहुत नाम कमाओगे।
मूर्तिकार प्रसन्न हुआ और उसने भगवान से कहा, आज्ञा हो तो मैं अभी आपसे कुछ कहना चाहता हूं।
भगवान की आज्ञा पाकर मूर्तिकार बोला, हे भगवान मैं जो मूर्तियां बनाता हूं, वह मंदिरों में, घरों में, पूजा घर में सजाई जाती हैं और लोग उसके आगे हाथ जोड़कर नतमस्तक होते हैं, पर प्रभु आपकी बनाई हुई असंख्य मूर्तियां जो आप बना बनाकर धरा पर भेजते हो,आपस में ही लड़ती झगड़ती रहती हैं, इसका क्या कारण है?
प्रभु ने बहुत ही विनम्र भाव से उत्तर दिया, मैं तो शुद्ध और सच्चे इंसान की रचना करता हूं, लेकिन मनुष्य खुद अपने शरीर में शैतान को जगा देता है, जिससे उसमें यह विकार आता है. मैं तुम्हारे द्वारा बनाई हुई हर मूर्ति में विद्यमान रहता हूं और यही संदेश देता हूं कि मन में शैतान को जगह मत दो, तो आप भी हर स्थान पर आदर सत्कार पाओगे.
सच भगवान ने कितना सुंदर संदेश दिया, हर इंसान अगर काम ,क्रोध, मोह, लोभ, आदि को अपने जीवन में स्थान न दे तो वह भी सब जगह पूरा सत्कार पा सकता है।

— जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845