पुस्तक समीक्षा

संवेदना के स्वर: बी.एल. गौड़ के काव्य समग्र-गीत में भाव-वैविध्य

बी.एल. गौड़ एक ऐसे कवि हैं जो पेशे से इंजीनियर और भवन निर्माता रहे, किंतु उनके भीतर एक संवेदनशील काव्य-मन सदैव धड़कता रहा। कई दशकों के रचनाकाल में उन्होंने गीत, कविता और कहानी विधाओं में अपनी लेखनी चलाई। उनका ‘काव्य समग्र-गीत’ हिंदी गीत परंपरा की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें संवेदना की घनता सर्वोपरि है। इस संकलन में कवि ने प्रेम, प्रकृति, आध्यात्म, सामाजिक चिंता, विरह, देशप्रेम, बाल-मन और जीवन-दर्शन सहित अनेक भावों को बड़ी कुशलता से शब्दों में ढाला है।

  1. प्रेम और अनुराग का भाव : संकलन में सर्वाधिक गीत प्रेम और अनुराग के हैं। कवि के प्रेमगीत छायावादोत्तर परंपरा के श्रेष्ठ प्रेमगीतों के समतुल्य हैं। इन गीतों की एक विशेषता यह है कि इनमें मिलन की उत्कंठा से अधिक प्रतीक्षा और विरह की पीड़ा है। कवि की मान्यता है कि प्रेम में प्रतीक्षा ही आनंद का स्रोत है, मिलन में नहीं। वे स्वयं लिखते हैं कि इसीलिए श्रेष्ठ प्रेमगीत प्रतीक्षाओं के गीत होते हैं। प्रेम के इस भाव में कवि का मन बार-बार अपने प्रिय की स्मृति में डूबता है। प्रिय के स्पर्श मात्र से जो रूपांतरण होता है, वह “छूकर तुमने मेरा प्याला” जैसी कविता में मार्मिक रूप से व्यक्त हुआ है। “जब तुम आये” में मिलन की अनुभूति इतनी सघन है कि लगता है कवि ने एक पूरा संसार रच दिया हो। प्रेम में कवि मन की चंचलता और उसकी असीम लालसा का भी चित्रण है। प्रेमी मन किसी एक स्थान पर नहीं टिकता—”मन तो मौसम सा चंचल है / सब का होकर भी न किसी का” — यह भाव उनकी कविताओं में बार-बार आता है।
  2. विरह और बिछोह का भाव : बी.एल. गौड़ के गीतों में विरह का स्वर बहुत मार्मिक और गहरा है। ब्रजभाषा में रचे उनके कई गीत — “परसों रात पपीहा बोलौ”, “सुन नंदी के बीरा”, “आधी रात बिजुरिया चमकै”, “रूठ गयौ सावन” — ऐसे हैं जिनमें विरहिणी नायिका की पीड़ा बहुत स्वाभाविक और हृदयस्पर्शी ढंग से व्यक्त हुई है। “आधी रात बिजुरिया चमकै” में बिजली की चमक के साथ पति की याद का आना, रोते-रोते भोर होना और प्रतिदिन पाती की प्रतीक्षा करना — ये सब विरह की तीव्रता को साकार करते हैं। “सुन नंदी के बीरा” में विरहिणी अपने पिया को संदेश भेजती है कि जीवन का कोई भरोसा नहीं, इसलिए जल्द आ जाओ। माघ महीने की कड़ाके की ठंड में सास की प्रताड़ना सहना और रोज अटरिया पर चढ़कर डगर निहारना — यह चित्र विरह की सम्पूर्णता को प्रकट करता है। “चमकी जब बिजुरी” में विरहिणी की काया प्रौढ़ हो गई है पर प्रियतम अभी भी परदेस में हैं। वर्षों की प्रतीक्षा में आँखों में ही ऋतुएँ बीत गई हैं — यह कवि की बिंब-रचना का एक अप्रतिम उदाहरण है।
  3. प्रकृति-प्रेम और सौंदर्यबोध : कवि का प्रकृति से गहरा और जीवंत संबंध है। वे सुबह हो, साँझ हो, गुनगुनी धूप हो, चिड़िया हो, गिलहरी हो, बसंत की बयार हो, फागुन का गमक हो, शरद के शहदीले दिन हों या ठंड में चटख धूप की आहट — प्रकृति के किसी भी पल को अनदेखा नहीं जाने देना चाहते। “देखो फिर मौसम बदला है / आँगन में गुलमोहर खिला है” — इस पंक्ति में केवल फूल के खिलने से मौसम के बदलाव का अहसास कर लेने वाली दृष्टि कवि को सामान्य प्राणी से अलग करती है। “सुहानी धूप” में धूप का आगमन जैसे एक सुख का संदेश लेकर आता है। “काश! कभी लौटे वह संध्या” में बचपन की संध्या की स्मृति एक मनोहारी बिंब बन जाती है। “काश! कभी लौट वह संध्या / लौट वह अधरों का कंपन” — यह स्मृतिधाई बिंब पाठक के हृदय को भी स्पंदित कर देता है। “सर सर करती हवा सरीखी”, “गिरते निझर्र का गीत लिखूँ”, “कब पानी में डूबा सूरज” जैसी कविताएँ कवि की प्रकृति-सौंदर्य के प्रति संवेदनशीलता का प्रमाण हैं। प्रकृति उनके लिए केवल पार्श्वभूमि नहीं, बल्कि एक जीवंत साथी है जो उन्हें प्रेरणा और आश्रय दोनों देती है।
  4. आध्यात्मिक और भक्ति-भाव : बी.एल. गौड़ के संकलन में आध्यात्मिक और भक्ति-भाव का एक सुंदर प्रवाह है। “सरस्वती वंदना” से प्रारंभ होकर यह भाव “राम तुम्हारा रूप निहारूँ” तक विस्तृत है। कवि सरस्वती से यह वर माँगते हैं —

“असमय जहाँ पुष्प मुरझाएँ
मेरे पाँव वहीं रुक जाएँ
किसी नयन से अश्रु झरें तो
मेरी आँखें भी भर आएँ”

यह केवल व्यक्तिगत भक्ति नहीं, बल्कि परकाया प्रवेश की वह संवेदना है जो कवि को औरों के दुख में सहभागी बनाती है। “राम तुम्हारा रूप निहारूँ / या सरयू का तीर / बिना तुम्हारी कृपा दृष्टि के / घटे न मन की पीर” — इन पंक्तियों में राम के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण का भाव है। कवि राम के अनुपम रूप के भक्त हैं, किंतु राम द्वारा सीता के परित्याग पर वे व्यथित भी होते हैं। “हे राम तुमने क्या किया / इतना कठिन निर्णय लिया / एक दुर्जन के कथन पर / त्याग दी पल में सिया” — यह प्रश्न कवि की उस मानवीय संवेदना का प्रमाण है जो न्याय और स्त्री-सम्मान के प्रति सजग है।

“ऊधो राधा को समझाना” में उद्धव-राधा प्रसंग के माध्यम से भक्ति की वह अव्याख्येय मनोभूमि व्यक्त हुई है जहाँ ज्ञान का तर्क प्रेम के आगे नतमस्तक हो जाता है। “ब्रज में कोरोना” में भक्त अपनी विपत्ति में कृष्ण और राधा माँ को पुकारता है — यह संकट-काल में भक्ति की आस्था का प्रकटीकरण है।

  1. निराशा, वेदना और अस्तित्ववादी पीड़ा

संकलन में कवि की व्यक्तिगत पीड़ा और जीवन की निरर्थकता का भाव भी गहरे रूप से व्यक्त हुआ है। “मैं सागर का नीर निहारूँ” में वे लिखते हैं —

“अब तो कुछ ऐसा लगता है
व्यर्थ हुआ जीना
झीनी अब हो गई चदरिया
क्या इसका सीना
अब तो जीवन की रेखा से लंबी मौत-लकीर।”

यह निराशा केवल व्यक्तिगत नहीं, युग-सत्य का भी प्रतिबिंब है। जब संबंध रीत जाते हैं, अपनेपन का आभास नहीं होता, तो जीने की निरर्थकता का यह बोध स्वाभाविक है। “भीतर से कुछ टूट गया है”, “चलते चलते थका बहुत मन”, “जाने क्यों हम समझ न पाये”, “जाने क्यों ऐसा लगता है” — ये कविताएँ उस अस्तित्ववादी संकट को व्यक्त करती हैं जो आधुनिक मनुष्य की नियति बन गया है। कवि लिखते हैं — “छली रात झूठे सपनों ने / यूँ ही उमर तमाम हुई।” जीवन भर सुखों को बटोरने के बाद भी मन बेचैन रहा — यह विरोधाभास ही जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है।

  1. सामाजिक चिंता और व्यंग्य : बी.एल. गौड़ राजनीतिक कवि नहीं हैं, किंतु जहाँ कुछ गलत होते देखा है, उसे कविता में उतारने की चेष्टा की है। “लाल किले से” में वे लिखते हैं —

“लाल किले से अब तक आए
कितने ही फरमान
यदि वे सब सच्चे हो जाते
मरता नहीं किसान।”

“परबत ऊपर राजमहल है” में सत्ता और गरीबी के बीच की खाई का चित्रण है — “बस्ती में रहता अँधियारा / निर्धनता भी एक सजा।” भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी से देश के संसाधनों के दोहन पर कवि का मन क्षुब्ध होता है। “जान किसकी नजर लगी है” में गाड़िया लुहारों की दारुण स्थिति का चित्रण है — सदियों से बिना पते-ठिकाने के भटकता यह समुदाय लोहे से जूझता रहा, लेकिन व्यवस्था ने कभी उनकी सुध नहीं ली। कोरोना महामारी पर उनकी कविताएँ उस दौर की पीड़ा का जीवंत दस्तावेज हैं — इलाज के बिना मरते लोग, घरों में कैद विवशता और चिकित्सा संसाधनों की कमी — ये सब उनकी कविताओं में मार्मिक रूप से आए हैं।

  1. देशप्रेम और राष्ट्रभावना

कवि का देशप्रेम भावनात्मक और प्रामाणिक है। “ये मेरा देश है प्यार”, “उठो देश के वीर जवानो”, “मैं हूँ बेटा प्यारे भारत का”, “देश धरातल को जाता है” — ये गीत अखंड भारत के सपने और राष्ट्र के प्रति गौरव के भाव से भरपूर हैं। वे स्वयं को “भारत माँ का बेटा” कहते हैं और जब देश रसातल को जाता दिखता है, तो उनके मन में पीड़ा होती है। हमारी संस्कृति में “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” — इस उद्घोष को वे अपने जीवन और काव्य दोनों में जीते हैं।

  1. ग्राम-जीवन और विस्थापन का भाव : “रूठ गयौ सावन” में कवि ने शहर आने की विवशता और गाँव के छूट जाने की पीड़ा को बड़ी संवेदना से व्यक्त किया है —

“रोटी की मजबूरी हमकू
नगर लिवा लाई
खाँसी पीड़ित बाबा छूटे
छूट गई माई
छूटी छोटी बहना छूटौ
लछमन सौ भाई
पीपर नीम बगीचा छूटे
छूट जंगल वन।”

यह ग्राम-नगर का संघर्ष केवल कवि का नहीं, करोड़ों भारतीयों का अनुभव है। नगर में आकर गाँव का मन “रेत में भागते हिरन सा” हो जाता है — यह विस्थापन की पीड़ा की सटीक अभिव्यक्ति है।

  1. ब्रजभाषा में रचे गीत और लोक-संस्कृति : संकलन की एक बड़ी विशेषता ब्रजभाषा में रचे गीत हैं। कवि का मन ब्रज में पला-पुसा है, इसलिए ब्रज की मधुर बोली के शब्द उनके काव्य को एक अलग सुगंध देते हैं। “केस, हँसुली जैसौ चंदा”, “जाने कैसौ रोग लगौ है”, “जौ अषाढ़ के कार बदरा”, “परसों रात पपीहा बोलौ”, “पूजे मैंने महावीर”, “आधी रात बिजुरिया चमकै”, “अब बरसैगो पानी”, “आगि लगै ऐसे फागुन में”, “चुटकी में सगरौ दिन बीतौ” — ये गीत लोक-संस्कृति की जीवंत परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। “आगि लगै ऐसे फागुन में” एक होली-गीत है जिसमें देवर-भाभी के हास-परिहास की मनोहारी छवि है। फागुन में बुढ़ऊ भी बौरा जाएँ, देवर गाल पर गुलाल लगाए, भाभी शरमाए — यह लोकजीवन की उल्लासमयी छवि बड़ी स्वाभाविकता से उभरी है।
  2. बाल-मन और जिज्ञासा का भाव : “चिड़िया का गीत”, “आज हुई कुछ बूँदा-बाँदी”, “बादल की मनमानी” जैसी कविताएँ ऐसी हैं जहाँ कवि लिखते हुए बच्चे बन गए हैं। बाल-मन की जिज्ञासा, प्रकृति के प्रति कुतूहल और सरल भाषा में जटिल सत्य कहने की क्षमता — ये सब इन कविताओं को एक अलग आयाम देते हैं।
  3. जीवन-दर्शन और आशावाद : कवि निराशावादी नहीं हैं। पीड़ा और वेदना के बावजूद वे जीवन के प्रति आस्थावान हैं। वे लिखते हैं —

“हर सुबह ने नित नया जीवन दिया है

क्यों किसी कल के लिए रोते रहें हम

क्यों न हँस कर आज का परिवेश जी लें।”

“मन को कभी न थकने देना / मन से राजमहल बनते हैं / मन से निर्मित होते मंदिर / मन से ताजमहल बनते हैं” — इस आशावादी दृष्टि में कवि का विश्वास है कि मन अथक और अप्रतिहत हो तो सब संभव है। कौन जाने फिर समय लौटे न लौटे — इन पलों को भरपूर जी लो — यह जीवन-दर्शन उनकी कविताओं का सूत्र-वाक्य है।

पुस्तक : काव्य समग्र-गीत

कवि : बी.एल. गौड़
प्रकाशक: हंस प्रकाशन, सोनिया विहार, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष: 2023

बिंब-योजना और भाषा-सौंदर्य

कवि की बिंब-रचना अत्यंत सटीक और जीवंत है। डूबते सूरज का बिंब, धीरे-धीरे उतरती शाम, आँगन में गुलमोहर का खिलना, रेत में भागता हिरन, झीनी चदरिया, जलती बाती, लहरों का आना और लौट जाना — ये सब बिंब कवि की काव्य-दृष्टि की परिपक्वता के प्रमाण हैं। बिना बिंब के कोई गीत हो ही नहीं सकता — यह उनकी काव्य-मान्यता है और उनकी रचनाएँ इसे चरितार्थ करती हैं। भाषा में खड़ी बोली हिंदी के साथ-साथ ब्रजभाषा का मनोहारी संयोग है। लोकगीतों की परंपरा से लिए गए शब्द, संगीतात्मक लय और छंद की सुदृढ़ पकड़ — ये सब मिलकर उनके गीतों को पढ़ने योग्य ही नहीं, गाने योग्य भी बनाते हैं।

उपसंहार : बी.एल. गौड़ का ‘काव्य समग्र-गीत’ हिंदी गीत-काव्य की उस परंपरा का सजीव प्रमाण है जो भाव और संगीत को अलग नहीं मानती। इस संकलन में प्रेम की उत्कंठा, विरह की पीड़ा, प्रकृति का सौंदर्य, भक्ति की आस्था, सामाजिक चिंता, देशप्रेम, ग्राम-जीवन की ललक, निराशा के बावजूद आशा — ये सब भाव एक-दूसरे में घुले-मिले हैं, जैसे चाय में चीनी घुली हो — अलग से न लक्ष्य हो, पर स्वाद में पूरी तरह मौजूद हो। ओम निश्चल के शब्दों में — “बी.एल. गौड़ का कवि विचार का कवि कम, संवेदना का कवि ज्यादा है। और कवि वही उत्तम होता है जिसकी संवेदना सघन हो।” यह संकलन उनकी उसी सघन संवेदना का दर्पण है जो गीत की विधा को जीवित और प्रासंगिक बनाए रखती है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563