पैरवीकार
एक नवोदित लेखिका की पुस्तक पढ़ते हुए शालिनी सोचने लगी। इससे तो अच्छा मैं लिख लेती हूँ । अब मैं भी अपने समय में से समय चुराकर कुछ अच्छा लिखूंगी और पुस्तक प्रकाशित करवाउंगी। इतना पढ़ लिखकर इन्हीं चूल्हा – चौका में उलझी हुई हूँ। अरे यह काम तो कोई अनपढ़ भी कर सकता है। घर के लोग ताना मार रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं…. आखिर मैंने पढ़ – लिख कर किया भी क्या है…?
शालिनी की कल्पना को जैसे पर मिल गये। वह पुस्तक प्रकाशित करवाने के लिए उत्सुक हो गई और एक परीक्षार्थी की तरह लेखन कार्य में लग गई।
ऐसे में जब वह रोटियाँ बेलती तो उसके मस्तिष्क पटल पर शब्दों की रोटियाँ भी कभी आड़ी – तिरछी तो कभी गोल बन रही होतीं। सब्जियाँ काटते हुए भी वह शब्दों को जोड़ – तोड़ रही होती। उसकी आँखों में पुस्तक प्रकाशन के सपने पलने लगे । लेकिन जब उसकी नज़रें अपने कमरे की बदरंग दीवारों तथा बिस्तर के जालीदार चादर पर पड़ती तो वह सीधे ख्वाबों के आसमाँ से उतरकर हकीकत के धरातल पर आ जाती। फिर भी जब कभी उदास होती तो अपने होठों पर मुस्कान की लाली चढा देती।
शालिनी के मन की जमीन पर भावनाओं के बीज अंकुरित होने लगे और फिर हृदय के मौसम के अनुसार रंग – बिरंगे फूल खिलने लगे जिसे बहुत ही कुशलता से शालिनी वर्ण माला में पिरोकर पन्नों के श्रृंगार बाॅक्स में सजाने लगी। धीरे-धीरे वो बाॅक्स भरने लगे तो शालिनी अपने सपनों को आकार देने के लिए वर्ण माला को चुन – चुन कर पाण्डुलिपि तैयार कर ली। पाण्डुलिपी तैयार करने के बाद वह अनेक प्रकाशकों से पुस्तक प्रकाशन के सम्बन्ध में बातें की। पर पुस्तक प्रकाशन में लगने वाला खर्च सुनकर जैसे मोर नाचते – नाचते जब अपना पैर देखता है तो रुक जाता है वैसे ही वह अपनी आर्थिक स्थिति देखकर मन मसोस लेती क्योंकि जब भी वह अपने मन के एक पलड़े पर पुस्तक प्रकाशित करवाने की इच्छा रखती और दूसरे पलड़े पर बच्चों की पढ़ाई, सास – ससुर की दवाइयाँ,तथा अन्य घरेलू खर्च तो दूसरा पलड़ा भारी लगता । ऐसे में वह परिस्थितियों के हवन – कुण्ड में अपनी अकांक्षाओं की तिलांजलि दे देना चाहती थी लेकिन उसकी अकांक्षाएँ कुछ अंतराल के बाद पुनर्जीवित हो उठती और वह फिर भावनाओं के सागर में गोते लगाते हुए शब्दों की मोतियों को मुट्ठी में भर लेती थी।
एक बार उसके मन में विचार आया कि क्यों न अपने पति से इस सम्बन्ध में बात करें? बात करने के लिए उसे निशा की मधुरिम वेला ही अनुकूल लगी। वह अपने पति के सर में सुगन्धित तेल से मसाज करते हुए पति के सामने अपनी बात रखी।
“एक बात करनी है आपसे।”
“कहो न “
“मुझे भी अपनी पुस्तक प्रकाशित करवानी है। “शालिनी बिना किसी भूमिका के साफ़ – साफ़ शब्दों में कह गई।
क्कककक्या…? शालिनी का पति अचम्भित होते हुए बोला।
“हाँ सच में, मेरी बहुत सी रचनाएँ एकत्रित हो गई हैं इसीलिए सोच रही हूँ कि मैं भी पुस्तक प्रकाशित करवा ही लूँ। शालिनी ने कुछ दृढ़ होकर कहा। “।
“पुस्तकों का करोगी क्या? कौन पुस्तकें पढ़ेगा तुम्हारी? देखो शालिनी यह आजकल का साहित्य भी अमीरों के घर की औरतों की किटी पार्टी बन कर रह गई है। औरतों की इन्हीं महत्वकांओं के मद्देनजर कुकुरमुत्ते की तरह साहित्यिक संस्थाएँ फल – फूल रही हैं।
महिलाएँ स्त्री विमर्श के नाम पर अपने मन की भड़ास काग़जों पर निकाल रही हैं। प्रकाशक मोटी रकम लेकर पुस्तक के नामपर कुछ भी छाप दे रहे हैं, फिर चाहे उस पुस्तक को कोई पढ़े या न पढ़े, यही वजह है कि साहित्य का स्तर दिनोंदिन गिरता चला जा रहा है ।
तुम भी उन महिलाओं की तरह यह बेकार का शौक मत पालो क्योंकि इस शौक के लिए पैसा व पैरवी दोनो ही होना चाहिए। ” सीमा का पति अनेक दलीलें देकर सीमा की इच्छाओं को उसी कमरे में दफ्न करना चाहा।
पैरवी? ” सीमा ने प्रश्न किया।
हाँ पत्र – पत्रिकाओं में रचनाएँ बिना जान – पहचान और पैरवी की नहीं प्रकाशित होती हैं। मैडम अब छोड़िये भी इन बातों को देखिये रात कितनी सुहानी है ” कहते हुए शालिनी का पति अपने सर पर रखे उसकी कोमल हथेलियों को अपनी हथेली में थाम कर शरारती अंदाज़ में शालिनी को अपने आगोश में भर लिया। शालिनी का स्त्रित्व पति के पुरुषत्व के समक्ष समर्पित हो गया।
शालिनी ने हार नहीं मानी। वह अपनी डायरी के पन्नों पर लेखनी की कूची से भावनाओं के रंग भरने लगी। एक दिन शालिनी की नज़र अखबार के साहित्य पृष्ठ पर अंकित एक मेल आई डी पर पड़ी जिसपर रचनाएँ आमन्त्रित की गई थीं। शालिनी अपनी कुछ रचनाएँ उसी आई डी पर मेल कर दी । कुछ हफ्ते बाद उसकी रचना दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित हो गई। रचना प्रकाशन के बाद से उसके पास बधाइयों तथा शुभकामनाओं के कितने ही मेल तथा काॅल आये ।उस दिन उसका उत्साह सातवें आसमान पर था। वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी। उसके मन पर लेखन का नशा और भी चढ़ता गया। अब शालिनी अपनी रचनाएँ अनेक पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेजने लगी। धीरे-धीरे उसकी रचनाएँ अनेक प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं साथ ही मानदेय भी मिलने लगा। शालिनी उन सभी पैसों को एकत्रित करने लगी। वह सोच रही थी कि कि जब सारे पैसे एकत्रित हो जायेंगे तो इन रुपयों से वह अपनी पुस्तक प्रकाशित करवा लेगी फिर तो उसे कोई ताना भी नहीं मार सकता क्योंकि वे उसके अपने कमाये हुए रुपये होंगे ।
धीरे-धीरे पैसे एकत्रित होने लगे। एक दिन उसके मोबाइल पर काॅल आया। शालिनी ने जब मोबाइल पर फ्लैश होता नाम देखा तो उसके अधरों पर मुस्कान के पुष्प खिल उठे। दरअसल वह काॅल उसकी एक सहेली सीमा का था जो काॅलेज में उसके साथ पढ़ती थी और अभी साहित्यक गतिविधियों में सक्रिय रहती है। सीमा उसे अपनी पुस्तक के लोकार्पण समारोह में मंच संचालन करने के लिए आग्रह कर रही थी।
सीमा ” देखो शालिनी कल मेरी पुस्तक का लोकार्पण है और मैं चाहती हूं कि इसका संचालन तुम करो।”
शालिनी “मैं?”
सीमा “हाँ तुम, मुझे पता है कि संचालन तुमसे बेहतर कोई भी नहीं कर सकता ।”
शालिनी “अरे सीमा वो काॅलेज वाला समय गया। अब मैं पूरी तरह से एक गृहिणी हो चुकी हूँ, मुझे नहीं लगता कि मैं कर पाऊँगी, एक जमाना हो गया मंच पर चढ़े। “
सीमा” इसीलिए तो कह रही हूँ कि अब तुम्हें घर – परिवार से हटकर अपने लिए भी समय चुराना होगा। इतना हुनर है तुममें। अबतक तुमने अपने-आप को घर के अन्दर कैद कर रखा है अब कोई बहाना नहीं चलेगा, मंच संचालन तो तुम्हें ही करना ही पड़ेगा। “
सीमा साधिकार बोल रही थी। सीमा के अपनापन भरे आग्रह को टालने की हिम्मत शालिनी में नहीं थी इसीलिए उसने स्वीकृति दे दी।
शालिनी मंच संचालन की तैयारी करने लगी। उसे याद आया कि वह काॅलेज के जमाने में आइने के सामने ही तो खड़ी होकर खुद वक्ता व श्रोता बनकर बोलने का अभ्यास किया करती थी, अतः उसने पुनः एक काॅलेज स्टूडेंट् की ही तरह अभ्यास करना शुरू कर दिया।
इस तरह से लोकार्पण का वह शुभ दिन भी आ गया। उस दिन शालिनी मन ही मन घबरा रही थी। सोच रही थी – “पता नहीं क्या होगा। इतने अन्तराल के बाद मंच पर इतने सारे प्रबुद्ध जनों के बीच बोलना है, मैं ठीक से संचालन कर पाउंगी भी या नहीं। ऐसा न हो कि कहीं मैं अटक जाऊँ….
उस दिन शालिनी सफेद पर लाल बार्डर वाली खादी सिल्क की साड़ी पहनी थी। सादगी से किये गये हल्के मेकप में उसका व्यक्तित्व और भी निखर गया था। वह सभागार में पहुंची तो सभी की नज़रें उसी पर टिकी हुई थीं।
शालिनी को देखकर सीमा खुश हो गई। सीमा शालिनी से चुहल करते हुए बोली – “ कहाँ बिजली गिराने का इरादा है मैडम…?
शालिनी ने नहले पर दहला मारते हुए कहा – बिजली तो सारी सीमा पार कर तुम गिराने आई हो।
तभी मुख्य अतिथि के आगमन की सूचना से आयोजक मण्डल के पैरों में विद्युत सी गति आ गई।
सीमा शालिनी से बोली – अब चलो मंच सम्हालो । “
शालिनी मंच की तरफ़ बढ़ रही थी। ” उस समय उसके हाथ पाँव काँप रहे थे। वह खुद को सम्हालते हुए मन ही मन माँ शारदे को नमन करते हुए माइक की तरफ़ बढ़कर सभा को सम्बोधित करती है।
सीमा अपनी तर्जनी अंगुली से अंगूठे को सटाकर इशारे से उसके संचालन की सराहना कर उसका मनोबल बढ़ाती है।
शालिनी के संचालन में कार्यक्रम सुन्दर व सुनियोजित तरीके से सम्पन्न हुआ। सभागार में उपस्थित सभी ने शालिनी के संचालन की सराहना की।
एक मंचासीन व्यक्ति ने शालिनी से उसका कांटेक्ट नम्बर मांगा ।
शालिनी ने उन्हें धन्यवाद कहते हुए अपना नम्बर दे दिया।
कार्यक्रम समाप्त होते – होते काफी देर हो गई। जब शालिनी की नज़र अपनी कलाई में बंधी घड़ी पर पड़ी तो वह अचानक एक संचालिका से आम गृहणी बन गई और जल्दी – जल्दी घर भागी। रास्ते भर उसके मन में यह भय सता रहा था कि अब तो निश्चित ही घर जाकर सबकी खरी – खोटी सुननी पड़ेगी इसलिए वह रणक्षेत्र में जाते योद्धा की तरह मन ही मन रणनीति तय करने लगी । उस समय उसे अपनी माँ से मिली दीक्षा याद आ गयी। माँ ने कहा था कि सौ बोलने वालों को एक चुप रहने वाला हरा सकता है। उसने सोच लिया कि चाहे कोई कितना भी बोले मैं किसी को जवाब नहीं दूंगी।
शालिनी घर पहुंची। सभी की नज़रें उसे घूर रही थी। सास ने घर में घुसते ही कहा –
इतनी देर तक घर से अकेली बाहर रहना अच्छी बहु – बेटियों का लक्षण नहीं है। कह के गई कि शाम चार बजे तक आ जाउंगी पूरे सात बज गये।
शालिनी चुपचाप बिना किसी सवाल का जवाब दिये अपने कार्य में लग गई। मन में सोच रही थी एक दिन थोड़ी देर क्या हो गई लग रहा है आफ़त आ गई। कौन सा मैं आधी रात को लौटी हूँ। यही न हुआ कि सासू जी को खुद से चाय बनानी पड़ी। अरे एक टाइम यदि खुद से चाय बना ही लिया तो क्या हो गया। दफ्तर में काम करने वालों को भी कम से कम हफ्ते में एक दिन की तो छुट्टी मिलती ही है। घर की बाई भी जब जी चाहे घर बैठ जाती है पर मेरी स्थिति तो उनसे भी बदतर है। शालिनी का जी चाह रहा था आज यह सब बात अपने पति से बोले। लेकिन फिर उसने सोचा कि क्या फायदा। दिन भर काम करते – करते एक तो रात बचती है जिसमें आराम किया जा सके। उसे भी चुगली करके गुजार देना अच्छा नहीं है।
शालिनी काम निबटाकर सोने चली गई।
सुबह उठकर शालिनी ने सारा काम समय पर निबटा लिया।
घर के सदस्यों को समय पर चाय, नाश्ता देकर वह पूजा करने चली गई। पूजा करके वह उठने ही वाली थी कि उसकी मोबाइल की घंटी बजी। नम्बर अनोन था इसीलिए शालिनी मोबाइल उठाकर अपने कमरे में चली गई.।
उधर से आवाज़ आई “हल्लो… शालिनी जी बोल रही हैं?
” जी कहिये, शालिनी शालीनता के साथ बोली ।
“मैं आकाशवाणी केन्द्र से बोल रहा हूँ।
आकाशवाणी केंद्र का नाम सुनकर शालिनी खुश हो गई। उसने उत्सुकता से कहा –
जी जी नमस्कार –
आपको एक वार्ता के लिये आमन्त्रित कर रहा हूँ क्या आप आ सकती हैं?” उधर से आवाज़ आई।
खुशी और आश्चर्य के घर्षण से शालिनी की आँखों में बिजली सी चमक आ गई और आवाज़ में थिरकन….” जी जी क्यों नहीं… कब आना है?”
” आप परसों ग्यारह बजे आ जाइये। “उधर से आवाज़ आई और फिर खत्म हो गई।” लेकिन शालिनी के कानों में वह आवाज़ एक मधुर गीत की तरह झंकृत हो रही थी। उसके पाँव अनायास ही थिरकने लगे और वह अपना काम निपटाकर वार्ता लिखने बैठ गई।
आकाशवाणी के बाद उसे दूरदर्शन केंद्र से भी आमन्त्रण आने लगा। इस तरह से उसके अकाउंट में कभी आकाशवाणी से तो कभी दूरदर्शन तथा अन्य पत्र – पत्रिकाओं से मानदेय आते रहे उसके सपनों को पंख देने लगे।
अब शालिनी के पास कुछ रूपये एकत्रित हो गये थे। वह एक प्रकाशक से बात करके पुस्तक प्रकाशित करने के लिए अपनी पांडुलिपि मेल से भेज दी।
उधर से मेल का रिप्लाई आया आया ” प्रिय शालिनी जी, आपका स्वागत है। हमें आपका पांडुलिपि-अंश प्राप्त हो गया है। हमने
उन्हें अपने संपादक-मंडल को अग्रेसित कर दिया है। 28 कार्यदिवस की अवधि में
हम आपसे संपर्क करेंगे।
धन्यवाद।
शालिनी का वो अट्ठाइस दिन काटे नहीं कट रहा था।
वह बार-बार मेल चेक कर रही थी। तभी एक मेल आया – हमें यह बताते हुए अत्यंत खेद हो रहा है कि संपादकों से मिली प्रतिक्रियाओं के बाद हम आपकी इस किताब को प्रकाशित कर पाने में असमर्थ हैं।
यदि आप चाहें तो इस मेल पर सम्पर्क कर सकती हैं। उसने कोई अन्य मेल आई डी दिया।
फिर शालिनी ने उस दिये गये मेल आई डी पर मेल किया। करीब चौबीस घंटे के बाद उस मेल का रिप्लाई आया जिसमें पुस्तक प्रकाशन की राशि पढ़कर शालिनी दुखी हो गई क्योंकि उसके पास उतनी राशि एकत्रित नहीं हो पाई थी और जो हुई भी थी तो उसने अपने बेटे के लिए मोबाइल खरीद दिया था।
शालिनी मन ही मन अपनी किस्मत को कोस रही थी।उसे लग रहा था उसके पति ठीक ही तो कह रहे थे। आज के जमाने में बिना पैसों और पैरवी के कुछ भी सम्भव नहीं है। पैसा आये भी तो कहाँ से। पति की कमाई तो बच्चों की पढ़ाई, सास – ससुर की दवाई तथा घर खर्च में ही खत्म हो जाता है।
शालिनी दुखी मन से अपनी पांडुलिपि को आलमारी के निचले दराज में डालकर बिस्तर पर लेट गई और सोने का प्रयास करने लगी लेकिन नींद थी कि आने का नाम ही नहीं ले रही थी। विवश होकर शालिनी अपना मन बहलाने के लिए पलंग के बगल में पड़ी कुर्सी पर से अखबार लेकर पलटने लगी तभी उसकी नज़र एक विज्ञापन पर पड़ी जिसमें राजभाषा विभाग से हिन्दी पाण्डुलिपि प्रकाशन अनुदान योजना की सूचना प्रकाशित हुई थी। सूचना पढ़कर निराश शालिनी की आँखों में आशा की किरणें चमकने लगीं और वह उसी समय अपनी पांडुलिपि जमा करने की योजना बनाने लगी।
शालिनी ने राजभाषा विभाग के बेबसाइट से पाण्डुलिपी जमा योजना का फार्म डाउनलोड करके प्रिंट निकाल लिया और फिर उसे भरकर अपनी पांडुलिपि के साथ प्रेस विज्ञप्ति पर जो पता लिखा था उसी पता पर भेज दी ।
पाण्डुलिपी भेजने के बाद शालिनी प्रतिदिन ईश्वर से प्रार्थना करती कि उसकी पाण्डुलिपी चयनित हो जाये। अब वह अपनी घर गृहस्थी तथा साहित्य के पथ पर संतुलन बनाते हुए चलने लगी। फिर भी कभी कभार किसी भी काम में ज़रा भी देर हुई तो उसे अपने पति तथा सास – ससुर के ताने सुनने को मिल जाते।
एक दिन शालिनी की सास बोलीं –
“इतना दिन रात लिखती रहती हो, आखिर उससे तुम्हें मिला क्या? इससे तो अच्छा होता कि सिलाई – कढ़ाई करती तो घर में दो पैसा भी आता।”
सास के मुंह से निकली तीर की तरह आवाज़ से शालिनी का हृदय छलनी हो गया। दुखी मन से वह अपने कमरे में जा रही थी तभी दरवाजे की घंटी बजी। शालिनी भुनभुनाती हुई वापस आई “ये घंटी भी मेरी दुश्मन बनी हुई है, दो घड़ी चैन की सांस नहीं लेने देती है…. ।
शालिनी ने दरवाजा खोला। सामने डाकिया एक लिफाफा लेकर खड़ा था। शालिनी अनमने ढंग से लिफाफा लेकर बैठक के जर्जर सेन्ट्रल टेबल पर रखने जा रही थी तभी उसे उसपर अंकित अपना नाम दिखाई दिया। लिफाफा राजभाषा विभाग से आया था। राजभाषा देखकर शालिनी का गुस्सा काफूर हो गया। उत्साहित होकर वह जल्दी – जल्दी लिफाफा खोलने लगी। लिफाफा खोलकर देखा तो उसमें एक पत्र था ।
शालिनी पत्र पढ़ने लगी। पत्र पढ़ते हुए शालिनी की आँखों से गंगा – यमुना की धारा बहने लगी। पर ये आँसू खुशी के थे। पत्र में लिखा था –
पाण्डुलिपी कारवां के लिए श्रीमती शालिनी को 50,000 ( पचास हजार) रुपये की अनुदान राशि दी जाती है। कृपया शीघ्र ही अपना बैंक विवरण आदि भेजें।
उस समय शालिनी को यह समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह एक सुन्दर सपना है या सच। वह पत्र को सीने से दबाये सीधे पूजा स्थल पर जाकर ईश्वर के आगे माथा टेकती है और ईश्वर से कहती है –
“हे ईश्वर मेरे पैरवीकार तुम ही हो।”
— किरण सिंह
