कविता

फागुन के रंग

कितनी बीती पूस की रातें,
कितने स्वप्न बसंत के,
याद दिलाती हर फागुन वो,
अंतरमुखी प्रिय उस कंत के।

पीली सरसों, पीत अमलतास,
बिखरे धरा पर रक्तिम पलाश,
हर रंगोत्सव का वह इंतज़ार,
वो रंग देता काश! यह एहसास।

दूर नेपथ्य से आते थे गीत,
तन-मन कर देते थे पुलकित,
लगता उस राग की नायिका मैं,
सोच-सोच हो उठती सस्मित।

कैसे कह दूँ तुझको साजन,
पर तुमने रंग डाला तन-मन,
देख गुलाल यूँ फेंकना हवा में,
बिन छुए ही बढ़ती धड़कन।

कितने गुज़रे फागुन रंगों के,
कितने बीते सावन-संग,
पर मन की पिचकारी अब भी
ढूँढे तेरा वो पहला रंग।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com