गीतिका/ग़ज़ल

लुप्त संस्कार – नैतिकता

खरीदो तेल, घी, खोवा, मिलावट ही मिलावट है।
प्लास्टिक फूल – पौधों से, सजावट ही सजावट है।

जाम का झाम सड़कों पर, कहीं जाना हुआ दूभर,
बड़े गड्ढे, कहीं टक्कर, रुकावट ही रुकावट है।

रातदिन दौड़ – भागी है, काम का बोझ भी सिर पर,
सुबह से शाम तक खटना,थकावट ही थकावट है।

न वर्षा है, न छाया है, न चलती है हवा ठण्डी,
धो रहे कार,घर ,गलियाँ,तरावट ही तरावट है।

न घर में भाँग भूजीं है,जुगत से चल रही रोजी,
मोबाइल हाथ में महँगा,बनावट ही बनावट है।

हुई संतान आवारा, पिता – माता दुखी – बेबस,
लुप्त संस्कार – नैतिकता,गिरावट ही गिरावट है।

दिनोंदिन बढ़ रही संख्या,नए बनते मकानों की,
पड़ोसी कौन पहचाने, बसावट ही बसावट है।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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