जीवन-चक्र
अब आंसू रुग्ण हो गए
संवेदना के गात हुए ठार
बे-मौसम पतझड़ हुए
कैसे बुहारुं पात???
एक -एक कर दीया बुझता रहा
जो था अभी दमकता रहा
सांसत में हैं प्राण
मिलती नहीं अर्थी को कंधें की शान…
लेकिन जीवन चक्र रुकता नहीं है
किसी भी काल के कराल से
हम भी चुनौती दे रहे
प्रलय के संहार को…
नए कोंपल फूटेंगे
धरा के गर्व से बार-बार
रक्षा करेगी प्रकृति देवी
मानव से मानव के उद्धार को..
निशब्द विदा दे रहे हम
आगे इस्पात की दीवार है
हालात से बंधे हुए हैं पांव
लेकिन शब्द से कंगाल नहीं…
— उमाकांत भारती
