कविता

जीवन-चक्र

अब आंसू रुग्ण हो गए
संवेदना के गात हुए ठार
बे-मौसम पतझड़ हुए
कैसे बुहारुं पात???

एक -एक कर दीया बुझता रहा
जो था अभी दमकता रहा
सांसत में हैं प्राण
मिलती नहीं अर्थी को कंधें की शान…

लेकिन जीवन चक्र रुकता नहीं है
किसी भी काल के कराल से
हम भी चुनौती दे रहे
प्रलय के संहार को…

नए कोंपल फूटेंगे
धरा के गर्व से बार-बार
रक्षा करेगी प्रकृति देवी
मानव से मानव के उद्धार को..

निशब्द विदा दे रहे हम
आगे इस्पात की दीवार है
हालात से बंधे हुए हैं पांव
लेकिन शब्द से कंगाल नहीं…

— उमाकांत भारती

उमाकांत भारती

जन्म : 10 सितम्बर 1948 ई. कृतियाँ- ममता की मूर्ति, प्रतिशोध, कैसे कहूँ, बदलते रिश्ते, काला दिन, बुढ़ापे का गणित, नया बेटा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 100 से अधिक कहानियाँ प्रकाशित। लघुकथायें एवं कवितायें भी प्रकाशित। आकाशवाणी से कहानी, लघुकथा, आलेख प्रसारित। सम्पादन- पलाश अर्द्धवार्षिक का 2014 से सम्पादन सम्पर्क- मेहता निवास, नया टोला, भीखनपुर, गुमटी नं. 12 के पास, भागलपुर-812001 बिहार सचल दूरभाष- 9608228922 E-mail umakantsingh34535@gmail.com