जीवन का आधार
तरुवर नद पर्वत झरने सब,जीवन का आधार है।
संरक्षण इनका करने से,जन जन का उद्धार है।
मानवता मानव का गुण है,हीन ना होना इस गुण से।
छल प्रपंच सब दूर भगाकर,निश्छल रहना तन मन से।
जीवन की बगिया महके जब, मुस्काता संसार है।
तरुवर नद पर्वत झरने सब,जीवन का आधार है।
कहीं रार- तकरार ना होवे, चहुँ दिश खुशहाली फैले।
पर उपकार जिए हर मानव,फूले फलें राम बेलें।
दानवता जग से मिट जाए,तो सपना साकार है।
तरुवर नद पर्वत झरने सब,जीवन का आधार हैं ।
प्रेम और भाईचारा हो, हर रिश्तों में नेह झरे।
भेद भाव की गहरी खाई, में नहि मानव जात घिरे।
सब का सुख दुःख साझा होवे,इतनी ही दरकार है।
तरुवर नद पर्वत झरने सब,जीवन का आधार है।
अहंकार को त्याग मनुज जब, निर्मल मन हो जाता है।
पंचतत्व का मर्म समझ कर , सारस्वत बन जाता है।
काम क्रोध मद लोभ सभी का छूटा कारोबार है।
तरुवर नद पर्वत झरने सब,जीवन का आधार है।
जीत हार से ऊपर उठकर, कर्म मनुज जब करता है।
क्षणभंगुर जग नश्वर काया का जब सत्य समझता है।
परम ब्रह्म मनहर ज्योति में पाता मन विस्तार है।
तरुवर नद पर्वत झरने सब,जीवन का आधार है
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
