बसंत
चहुंओर हरीतिमा छाई,
प्रकृति दुल्हन बन आई ।
आया बसंत -छाया बसंत,
ऋतु ऐसी, गुम हुआ संत ।
महक रही कली- कली,
कोयल घोली मिश्री की डली ।
मन बेचारा है बौराया,
ऋतुराज बसंत है आया।
निर्मल- कोमल पत्ते- फूल,
हृदय में चुभता प्रेमशूल ।
भॅंवरे -तितली सुंदर-सुंदर,
छेड़ रहे अद्भुत स्वर ।
झर-झर झरनों का संगीत,
आंखों से हृदय तक प्रीत ।
प्रेम प्रकृति का है स्वभाव,
रे मानव! तू मत खा भाव ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
