कहानी

कहानी – याद आ गई वो

जब – जब कोई त्यौहार आता है, बाजारों की रौनक, चहल-पहल बढ़ जाती है। होली का त्योहार , दीपावली का त्योहार तो भारतीय संस्कृति में अनूठा है। होली तो प्रेम के रंग में रंग दिया करती है।
होली आ गई थी, श्याम भी बाजार में अपने लिए कुछ हवन, पूजन की सामग्री लेने गया था। उस पंसारी की दुकान पर भीड़ कुछ कम थी। श्याम अपनी सामग्री लिखाकर, अपने सामान के पैकेट का इंतजार कर रहा था।
तभी एक सज्जन श्याम से उम्र में थोड़ा बड़ा जिसके चेहरे की चमक उसके खुशहाल जीवन की निशानी थी। उस सज्जन ने दो हजार रुपए किलो चिरौंजी का भाव सुनकर चिरौंजी लेने से मना कर दिया था।
श्याम ने कहा, “यह क्या भाई साहब, क्यों होली का मजा किरकिरा कर रहे हैं!”
उसने कहा, “भैया, हमारे पास है ही कौन! हम दो जन हैं। बच्चे सभी बाहर हैं, कर लेंगे त्योहार बिना चिरौंजी के ही, दो जन कितना खाएंगे!”
उसकी बात सुनकर श्याम ठठाकर हंस पड़ा था। वह श्याम को प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहा था। श्याम ने उससे कहा, “सारी दुनिया तो है तुम्हारे पास, अगर बेटा – बेटी, बहुएं सभी कोई होता, भीड़ भरी बाजार में भी होते आप; तो भी अकेले होते अगर आपकी जोड़ी टूट गई होती, आपकी पत्नी नहीं होती तो!”
उस आदमी के समझ में आ गया था। वह अब सौ ग्राम चिरौंजी खरीद कर वहां से चला गया था।
श्याम को याद आ गई वो! श्याम को उसकी याद आते ही उसके छाती में खालीपन महसूस हो रहा था। वह अजीब सा अकेलापन महसूस किया था। श्याम के दिल में एक अजीब सी हलचल मच गई थी।
श्याम समझ रहा था कि, लोगों के लिए वो चली गई है, श्याम जिंदा है। जबकि सच्चाई यह थी कि, श्याम जिंदा नहीं था। श्याम तो उसी दिन मर गया था, उसके बिना श्याम, श्याम कहां था।
वो याद क्या आई श्याम सबकुछ भूल गया था। श्याम को भारती के जाते ही समस्याओं ने आकर घेर लिया था। बिजली का बिल, खेत की समस्या, वारिस की समस्या, बैंक का कर्ज, गांव के महाजन का कर्ज जाने कितनी समस्याओं से श्याम घिर गया था। श्याम अब शक्तिहीन हो गया था, ठीक ऐसे जैसे, किसी पौधे की जड़ ही नहीं बची हो, पानी में भी किसी-किसी पैधे की जड़ खत्म हो जाती है।
भारती के जाने से परिवार की एकता जा चुकी थी। बहुएं अपने-अपने पतियों के कान भरना शुरू कर दिया था। जबकि सच्चाई यह थी कि, श्याम के पास सीमित जमीन के अलावा सोना-चांदी का एक नग भी नहीं था।
बच्चे आपस में अपने-अपने ससुराल वालों, साढ़ुओं की धमकी एक-दूसरे को देने लगे थे। अभी श्याम जिंदा था, श्याम की सांसें चल रही थीं फिर भी वह आपस में टकराने की जद्दोजहद करने लगे थे।
श्याम अपनी अकेली जिंदगी से तंग आ गया था। श्याम किसी बेटे-बहू को यह नहीं कहता था कि, मुझे खाना खाने को दे दो! सिर्फ एक लड़का पास में रहता था, वह कभी-कभी हिम्मत देता था इसलिए वह जी रहा था।
श्याम को बहुत ताज्जुब हो रहा था कि, इतनी जिल्लत भरी जिंदगी होकर भी उसे न दिल का दौरा पड़ा न ही कोई दूसरा अटैक आया। श्याम अपने आगे रो लेता था, बांकी भीड़ में खुश रहने की एक्टिंग करता था।
यह जिंदगी बड़ी अलबेली है, जाने क्या-क्या गुल खिलाती है, कभी हंसाती है, कभी रुलाती है। श्याम भारती को पाकर जिंदगी का एक पार्ट हंसने में, खुशियों में बिताया था। अब भारती का जाना क्या हुआ सारा तिलस्म धराशाई हो गया। अब श्याम को दूर-दूर तक कोई भी, किसी प्रकार की भी खुशी नहीं दिखाई दे रही थी।
श्याम खुशी को खोजने के लिए प्रयासरत था, दूर-दूर तक उसे खुशी का नामोनिशान नहीं दिखाई देता था। गम का रेगिस्तान जहां तक नजर जाती थी दूर-दूर तक फैला हुआ दिखाई देता था।
भारती की याद करके श्याम विचलित हो रहा था। श्याम सिर्फ नेक काम करने का बीणा उठा लिया था, फिर भी उसे अपयश के शिवाय कुछ भी नहीं मिला था।
श्याम भारती की गृहस्थी गांव में चर्चित गृहस्थी हुआ करती थी। जबतक श्याम की भारती थी, दरवाजे से कोई अतिथि, आगंतुक बिना कुछ खाए, पीए श्याम के दरवाजे से नहीं गया था। सभी वह वस्तुएं भारती के पास मिल जाती थीं जो, गृहस्थी में होनी चाहिए थी।
आज श्याम सहानुभूति में जी रहा था। लोग सहानुभूति के लिए भोजन दे रहे थे। श्याम अब अपने जीवन से निराश होता जा रहा था। श्याम अब बाजार से पूजा सामग्री के अलावा कोई सब्जी तक नहीं खरीदता था अब! श्याम अपने कमरे में खटिया बिछाकर बैठ जाता था, वह भारती की याद में बैठकर सारी रात बिता देता था।
महाकाल की नगरी उज्जयिनी में बिना किसी गिनती के श्रद्धा के साथ जाने वाली भारती – श्याम की जोड़ी चर्चित जोड़ी थी।
क्षिप्रा का वह पावन पवित्र किनारा, रामघाट से थोड़ी आगे उत्तर की ओर बढ़कर एक ऐसी जगह जहां भीड़ कुछ कम थी वे वहीं बैठ गए थे। वह दंपति श्याम – भारती की जोड़ी अपने भाग्य को सराहते हुए मां क्षिप्रा से विनती करके दोनों वही बात दुहराते थे, ‘मां कोई सात जन्म तक ही नहीं जब-जब इस धरती पर हम दोनों जन्म लें, तब-तब हम दोनों पति-पत्नी हों; योनि कोई भी हो कर्मानुसार जोड़ी हमारी हो, कृपा आपकी, महाकाल की बनी रहे!’
सभी तीर्थों में यही विनती एक राय में वो दोनों करते थे। भारती अपने चिर-परिचित अंदाज में आकर मां से आंचल फैलाकर मांगती थी, “हे मां, मैं अपने पति श्याम की बाहों में दम तोड़ दूं!”
यहां श्याम उदास हो जाता है, भारती से उसकी उदासी कहां छुपने वाली थी। भारती श्याम को अपनी बाहों में भरकर कहती है, “उदास मत हो मेरे सरताज! मैं जानती हूं मेरे पति के बराबर किसी का पति नहीं प्यार करता है। तुम फिर कहोगे सभी पति-पत्नी एक-दूसरे को प्यार करते हैं। तुम्हारी यह बात सच है, मगर मेरी भी बात सच है कि, तुम्हारे बराबर कोई प्यार कर ही नहीं सकता है!”
क्षिप्रा मां की धारा से उठती तरंगों से ऐसा लग रहा था जैसे, भारती सच कह रही है, मां क्षिप्रा कह रही है। लोक लाज दोनों में कूट-कूट कर भरा हुआ था। वहां पहचान का कोई नहीं था पर दोनों को ऐसा लगता था जैसे, क्षिप्रा उनके जान-पहचान की उनकी माई है।
तभी एक अंग्रेज महिला को अपनी ओर आता देखकर भारती श्याम से कहा, “लगता है यह अकेली है हमसे कुछ पूछना चाहती है। इसको अपने साथ ही, उसी लाज में रखवा देंगे!”
इतनी अच्छी थी भारती! श्याम ने भारती से कहा, “बड़ी भोली है तू! यह वातानुकूलित कमरे में रहेगी, इसका कमरा आरक्षित हो गया होगा। आने दो देखते हैं क्यों आ रही है!”
वह पतली कमर वाली, छरहरे बदन वाली अंग्रेजन उनके पास आई तो उसके साथ पिट्ठू झोला टांगे एक काला कलूटा, लम्बे टांगों वाला एक आदमी भी आया। भारती ने झटपट उसे अपने पास बैठाया, अपने झोले से निकाल कर पेड़ा खाने को उसे दिया था। श्याम मना किया था फिर भी वह नहीं मानी थी।
इतनी खूबसूरत अंग्रेजी लड़की थी कि कुछ पूछो मत, नख से सिख तक वह सुंदर थी। ऐसा लगता था जैसे कोई परी हो या स्वयं कोई देवी उनके पास आई हो!
भारती ने उस अंग्रेजन से कहा था कि, “यह नौकर है, तुम्हारे साथ?”
उस अंग्रेज महिला ने कुछ पेड़े अपने साथ रहे आदमी को भी खाने को दिया था। दोनों पेड़ा खाने लगे थे। भारती की बात को वह अंग्रेज महिला ने सोचा कि, पेड़ों के बारे में पूछ रही होगी! उसने कहा, “यस, स्वीट, थैंक्यू!”
श्याम को हंसी आ गई थी। फिर श्याम ने अंग्रेजी में भारती की बात को उस अंग्रेजन से पूछा था। उस अंग्रेजन ने बताया था कि, “यह मेरा हसबैंड है, मैं पेरिस की हूं, यह अफ्रीका का है। हम दो साल से पति-पत्नी हैं!”
श्याम जब इस बात को भारती से बताया था तब भारती बहुत अचम्भित हो गई थी। भारती कहने लगी थी कि, “क्या देखकर इसके साथ शादी कर लिया है!”
श्याम भारती को समझा दिया था कि, “पैसे वाला होगा शायद! फिर जिसका जिससे टांका फिट हो गया!”
कुछ जानकारी वह दोनों श्याम से लेकर आगे चले गए थे। अबतक यह दोनों कुछ संयत हो गए थे।
ऐसा लगता था कि, क्षिप्रा की लहरें श्याम दंपति से कुछ कह रही थीं। क्षिप्रा क्या कह रही थी, किसी को क्या पता! फिर भी यह दोनों क्षिप्रा की लहरों में उठती तरंगों को देख रहे थे, वह भगवान महाकाल, मां क्षिप्रा से विनती करके अपनी जोड़ी सलामत रखने की विनती कर रहे थे।
ऐसी खुशबू से सराबोर जिंदगी भारती संग श्याम जी रहा था। चार दशक यूं बीत गए थे कि, कुछ पता ही नहीं चला! यह चार दिन मात्र तीन साल के एक-एक दिन कटाए नहीं कट रहे थे। जिंदगी में जब जोड़ी की बहुत सख्त जरूरत थी तब भगवान ने उनकी जोड़ी ही तोड़ दिया था।
जाने किसकी नजर उनकी खुशियों में लग गई थी। दोनों स्वच्छंद क्रौंच पक्षी की तरह चहकते हुए जीवन गुजार रहे थे, उनकी न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर वाली जिंदगी थी। बन सका तो अच्छा कर दिया करते थे वरना अपनी जिंदगी में मगन रहते थे।
“कहां खो गए श्याम भैया, तुम्हारा सामान पैक कर दिया गया है!” दुकानदार ने लगभग झकझोरते हुए श्याम से कहा था।
श्याम जैसे गहरी नींद से जागा हो! वह सामान लेकर घर की ओर चल पड़ा था। श्याम को बाजार अच्छी नहीं लगती थी। श्याम को एकांत – सूनसान में भी अच्छा नहीं लगता था।
श्याम को उजाला नहीं अच्छा लगता था, श्याम को अंधेरा नहीं सुहाता था। श्याम के लिए सबकुछ, सब कोई बेगाना लगता था। श्याम को हरी-भरी वादियां जहां से भारती के साथ रहते समय हटने का मन नहीं करता था, आज वही हरी-भरी वादियां श्याम को जलते हुए रेगिस्तान की तरह लगती थीं।
भारती के होते हुए जून में तपता रेगिस्तान भी हरा-भरा लगता था, आज अकेले श्याम को वह जलाने के लिए दौड़ता हुआ लगता था।
श्याम को यह बची-खुची थोड़ी सी जिंदगी में नर्क का आभास हो रहा था। श्याम के लिए खाना स्वाद के लिए नहीं वह सिर्फ जीने के लिए पेट भरने के लिए था। श्याम को कोई भी व्यंजन, पकवान की इच्छा, लालसा नहीं होती थी। भारती के साथ जो खाना खाने में स्वादिष्ट होता था, जो स्वादिष्ट नहीं होता था आज, श्याम को सभी का स्वाद एक जैसे लगता था।
घर आकर अपने कमरे में खटिया बिछाकर पड़ गया था श्याम! बच्चे होली खेलने में मस्त थे, एक-दूसरे को गुलाल लगाते जोड़ों को देखकर भाव-विह्वल श्याम के दिल में जलन होने लगी थी।
श्याम को ईर्ष्या नहीं बगावत हो रही थी। श्याम देर रात तक वहीं पड़ा रहा था। श्याम के प्रति सहानुभूति रखने वाले, उसपर दयाभाव रखने वाले कुछ लोग गुझिया, खाखर – पापड़ दे गए थे जिसे वह निहार रहा था।
श्याम को पता ही नहीं था कि, वह भूखा है या नहीं! किसी तरह पेट में जीने के लिए दाना , अनाज डालता था। अकेला कैसे खाता श्याम, उसकी भारती जो नहीं थी।
बिजली जल रही थी, एक अंधेरे का रेला फिर भी श्याम को चारों तरफ से घेरने लगा था। उस अंधेरे में कोई मुंह बाए श्याम की ओर आ रहा था जैसे, श्याम को वह निगलना चहता हो!
जलते बिजली के बल्ब श्याम को उजाला नहीं दे पा रहे थे। श्याम के अंदर का, दिल का बल्ब बुझ गया था। उसे हजारों बिच्छू दंस मार रहे थे।
श्याम सबकुछ, सबको भूल गया था। श्याम को भारती याद आ रही थी, श्याम भारती को पूरी ताकत से बुला रहा था; उसकी आवाज को कोई नहीं सुन पा रहा था। श्याम की आवाज नहीं निकल पा रही थी।
श्याम को अब एहसास हो रहा था। अब कोई फायदा नहीं था, जानना नहीं जानना कोई मतलब नहीं था। श्याम को याद आ रही थी, भारती के साथ जीवन यात्रा, जो मंगलमय थी।
श्याम रेल के प्रथम श्रेणी में यात्रा भारती के साथ एक बर्थ, एक सीट में कर रहा था। टी टी आया था भारती को उस ट्रेन से ही उतार दिया था। श्याम को जनरल डब्बा में यात्रा करने को मजबूर कर दिया था।
श्याम चाहता था कि, कब यह गाड़ी रुके, कोई स्टेशन आए या नहीं आए वह उतर जाएगा, कूद जाएगा। कुछ भी हो वह दरवाजे के पास ही खड़ा था।
उसके जीवन का अंधेरा बढ़ता ही जा रहा था। कोई अज्ञात उसकी ओर मुंह बाए बढ़ता आ रहा था। जाने कब बत्ती गुल हुई, जाने कब, कहां गाड़ी रुकी श्याम खुद नहीं जान पाया था।
श्याम की यह यात्रा समाप्त हो चुकी थी। अकेला आया था, अकेला ही चला गया था। भारती से मिल पाया था या नहीं, यह कोई नहीं जान सकता था।
कमरे में अब भी बल्ब रौशनी बिखेर रहे थे। पंखा अभी भी मच्छरों को भगाने के लिए जोर लगा रहा था। पंखा छत पर अपनी ताकत से घूम रहा था, जो श्याम के लिए सब बेकार था, वह तो अब जा चुका था।
श्याम को याद आ गई वो, जो उसकी – अपनी थी। श्याम शायद भारती की बाहों में समा गया था। उसकी भारती उसके लिए वहां भी पलकें बिछाए खड़ी थी।

— डॉ. सतीश “बब्बा”

सतीश बब्बा

पूरा नाम - सतीश चन्द्र मिश्र माता - स्व. श्रीमती मुन्नी देवी मिश्रा पिता - स्व0 श्री जागेश्वर प्रसाद मिश्र जन्मतिथि - 08 - 07 - 1962 शिक्षा - बी. ए. ( शास्त्री ) पत्रकारिता में डिप्लोमा, कहानी लेखन एवं पत्रकारिता में डिप्लोमा। संप्रति - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं, संकलन में 1985 से लगातार प्रकाशित, तिब्बती पत्रिकाओं में प्रकाशित और भारत तिब्बत मैत्री संघ का सदस्य, संरक्षक भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महा संघ उ प्र। साहित्य केशरी आदि लगभग 1500 से अधिक साहित्य सम्मानों से सम्मानित प्रकाशित :- कविता संग्रह "साँझ की संझबाती" मोबाइल ऐप्स में प्रकाशित लघुकथा / कहानी संकलन "ठण्ड की तपन" और कहानी संकलन "सुदामा कलयुग का" प्रकाशित, अमाजोन आदि पर उपलब्ध! पता - ग्राम + पोस्टाफिस = कोबरा, जिला - चित्रकूट, उत्तर - प्रदेश, पिनकोड - 210208. मोबाइल - 9451048508, 9369255051. ई मेल - babbasateesh@gmail.com