मोहमाया और इज़ाज़त
ना जाने ऐसी वह कौन-सी घड़ी थी,
कैसे ‘मोहमाया में लिपटी’ खड़ी थी।
आने की इज़ाज़त दे ‘मौन’ पड़ी थी,
लापता आफ़त दरवाजे पे खड़ी थी।
यूं कितनी चुप्पी साधे रखेगा इंसान,
हमारे आसपास ही खड़े हुए शैतान।
यहाँ सिर पे नाच रहे हैं बनके हैवान,
हम हैं वरिष्ठ नागरिक यह है जवान।
इनसे न जाने कब तक छूटेगा पीछा,
जमाने के सामने दिखा रहे हैं निचा।
इन्हें पाल-पोसकर हमने ही है सिचा,
हे रब दे सदबुद्धि यहीं हमारी इच्छा।
— संजय एम तराणेकर
